आज की परिस्थिति और कांग्रेस का दृष्टिकोण - 1
जून 2011
अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी


स्वतंत्रता हमारा जन्म-सिद्ध अधिकार है। क़रीब दो सौ साल औपनिवेशिक साम्राज्य के मातहत रहने के बाद भारतवासियों ने महात्मा गांधी और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेतृत्व में आज़ादी के अपने हक़ को फिर पहचाना। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भारत के स्वाधीनता संग्राम की अगुआई की; 15 अगस्त 1947 को आज़ादी की जंग जीती; भारत के संविधान-निर्माण की प्रक्रिया शुरू की, जो 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ; और लोकतांत्रिक तथा संसदीय सरकार के गठन की बुनियाद रखी।

2. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के संविधान की धारा-1 में कहा गया है कि पार्टी का लक्ष्य संसदीय लोकतंत्र पर आधारित समाजवादी राष्ट्र की स्थापना करना है।

3. हमारे लोकतंत्र का सार है--प्रतिनिधि सरकार। लोग संसद, राज्य विधानसभाओं, नगर-निकायों और पंचायतों के लिए अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करते हैं। कोई भी सरकार तब तक एक बेहतर सरकार नहीं हो सकती, जब तक कि वह एक प्रतिनिधि-सरकार न हो। प्रतिनिधि-सरकार बनाने का एकमात्र तरीक़ा है--स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव।

4. आज़ादी के बाद से, केंद्र और राज्यों में विभिन्न सरकारें रही हैं। पिछले 64 वर्षों में भारत का हर राजनीतिक दल कभी-न-कभी सरकार में रहा है। जनता ने सरकारों को सत्ता से बाहर भी किया है और उन्हें दोबारा भी सत्ता सौंपी है।

5. 2004 में हुआ लोकसभा चुनाव एक निर्णायक चुनाव था। छह साल में दो बार भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार का कामकाज देख लेने के बाद भारत की जनता ने भाजपा को सत्ता से बाहर जाने का रास्ता दिखा दिया और कांग्रेस तथा उसके सहयोगी दलों को सत्ता सौंपी। लेकिन यह जनमत सीमित था। कांग्रेस को सिर्फ़ 145 सीटें मिली थीं। फिर भी, यह पूरी तरह साफ हो गया था कि जनता चाहती है कि कांग्रेस और उसके सहयोगी दल मिल कर एक ऐसी पंथ-निरपेक्ष, उदार और प्रगतिषील सरकार की स्थापना करें, जो सर्व-समावेषी प्रगति के रास्ते पर तेज़ी से चले। अगर 2004 का जनादेश महत्वपूर्ण था तो 2009 का जनादेश उससे भी ज़्यादा महत्व रखता था। भारत की जनता ने उस चुनाव में, लोकसभा में भाजपा के सदस्यों की संख्या को 138 से घटा कर 116 कर दिया और कांग्रेस के सदस्यों की संख्या 145 से बढ़ कर 206 हो गई। कांग्रेस को न सिर्फ़ एक नया जनादेश मिला, बल्कि अपने घोषित नज़रिए के मुताबिक देश का निर्माण करने के लिए पहले से भी ज़्यादा व्यापक जन-समर्थन मिला।

6. पिछले सात वर्षों में (यूपीए-1 के पांच वर्ष और यूपीए-2 के दो वर्ष) में कांग्रेस ने सुशासन मुहैया कराया है।

7. अप्रैल-मई 2011 में चार राज्यों और एक केंद्र-शासित प्रदेश में चुनाव हुए। विधानसभाओं की 824 सीटों के लिए मतदान हुआ। इन चारों राज्यों और एक केंद्र-शासित प्रदेश में कांग्रेस एक महत्वपूर्ण दावेदार थी। कांग्रेस ने 354 सीटों पर चुनाव लड़ा और 171 जीतीं। कांग्रेस के सहयोगी दलों ने अलग-अलग राज्यों में 243 सीटें हासिल कीं। देश का सत्तारूढ़ दल बनने का सपना देखने वाली सबसे प्रमुख विपक्षी पार्टी भाजपा ने 411 सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारे थे। इनमें से सिर्फ़ 5 ही जीते। हालांकि राज्यों में होने वाले चुनाव केंद्र सरकार के कामकाज पर जनमत संग्रह नहीं माने जाते, लेकिन वे जनता के रुख का निर्णायक संकेत तो देते ही हैं।

8. भ्रष्टाचार का मसला, हाल ही के महीनों में काफी चर्चा का विषय रहा है। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के बुराड़ी में हुए अधिवेशन में, 18 दिसम्बर 2010 को, कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी ने कहा था : ''भ्रष्टाचार या कदाचार को बर्दाश्त करने का सवाल ही नहीं है। हमने अपने काम से यह ज़ाहिर भी किया है। आरोपों के साबित होने का इंतज़ार किए बिना हमने अपने मंत्रियों और मुख्यमंत्रियों से जांच के दौरान ही हटने को कह दिया। बाकी कितने राजनीतिक दल हैं, जो ऐसा करने का दावा कर सकते हैं? क्या खुलेआम हो रहे भ्रष्टाचार के चलते कर्नाटक में या दूसरे किसी राज्य में भाजपा ऐसा क़दम उठाने का साहस कर सकती है?"

9. भ्रष्टाचार के साथ काले धन का मुद्दा भी उठाया गया है।

10. अलग-अलग लोगों द्वारा उठाई गई कई मांगें जानकारियों के अभाव का नतीजा हैं और बेबुनियाद हैं। मिसाल के लिए, यह कहना कि '400 लाख करोड़ रुपए विदेशों में जमा है', एकदम हास्यास्पद दावा है। ऐसे ही कई अनर्गल दावे किए जा रहे हैं। मसलन, भाजपा ने दावा किया कि काला धन सवा 11 लाख करोड़ से साढ़े 22 लाख करोड़ रुपए के बीच है--यानी ढाई सौ से पांच सौ बिलियन अमेरिकी डॉलर के बीच। लेकिन अचानक ही 22 लाख करोड़ का यह आंकड़ा उछल कर 400 लाख करोड़ रुपए का हो गया! किसी का यह सोचना भी कमाल की अज्ञानता ही है कि एक रुपए की कीमत पचास अमेरिकी डॉलर के बराबर हो सकती है। एक हज़ार और पांच सौ रुपए के नोटों को बंद करने की मांग भी अव्यावहारिक है और यह सोचे बिना की जा रही है कि ऐसा करने के क्या नतीजे होंगे?

11. बहरहाल, सरकार ने इन सभी मुद्दों पर बहस को प्रोत्साहन दिया है और कई लोगों को सकारात्मक संवाद की प्रक्रिया से जोड़ा है। इन मसलों के हल की रूपरेखा भी सरकार ने तैयार कर ली है और देश की अर्थव्यवस्था को लाभ पहुंचाने वाले ठोस क़दम उठाए जा रहे हैं।

12- हम यह बात पूरी तरह साफ करना चाहते हैं: कि कांग्रेस पार्टी और केंद्र तथा राज्यों में काम रही उसकी सरकारें सु-षासन देने के लिए प्रतिबद्ध हैं। कांग्रेस पार्टी भ्रष्टाचार के सख्त खिलाफ़ है और भ्रष्ट पाए जाने वाले किसी भी व्यक्ति के विरुद्ध ऐसी कठोर कार्रवाई करने से बिलकुल नहीं हिचकेगी कि एक मिसाल क़ायम हो। इस मामले में अगर किसी पार्टी का सिर शर्म से झुकना चाहिए तो वह है भारतीय जनता पार्टी। पंजाब, मध्यप्रदेश, कर्नाटक और गुजरात में भाजपा के कई मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं। भाजपा के एक पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष रिश्वत लेने के आरोप का सामना कर रहे हैं। भ्रष्टाचार शब्द का ज़िक्र होते ही आज लोगों के दिमाग़ में कर्नाटक सरकार की सूरत घूमने लगती है।

13- कांग्रेस पार्टी ने हाल ही के महीनों में ऐसे कई क़दम उठाए हैं, जो उसकी साफ नीयत का स्पष्ट प्रतीक हैं। मिसाल के तौर पर, सरकार एक मज़बूत और ठोस लोकपाल विधेयक का प्रारूप तैयार करने के काम में लगी है, जिसे संसद के वर्षाकालीन सत्र में पेश किया जाएगा। ऊंचे पदों पर बैठे कई लोगों पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच का काम सीबीआई को सौंप दिया गया है। जांच के काम पर सुप्रीम कोर्ट की निगरानी का सरकार ने स्वागत किया है। भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ संयुक्त राष्ट्रसंघ के सहमति-पत्र की सरकार ने पुष्टि की है। विदेशी सार्वजनिक-सेवकों की रिश्वतखोरी को दंडनीय अपराध बनाने के लिए भी एक विधेयक पेश किया गया है।

14- काले धन के मामलों से निपटने के लिए सरकार ने निम्नांकित क़दम उठाए हैं :
 

  • यूपीए-1 के शासनकाल में, धन की अवैध आवाजाही रोकने के लिए क़ानून बनाया गया, जिसमें संपत्ति ज़ब्त करने का भी इंतजाम है।

  • यूपीए-2 के शासनकाल में, आयकर के छापों में 18,750 करोड़ रुपए ज़ब्त किए गए; आयकर सर्वे में 12,000 करोड़ रुपए सामने आए; और माल तथा सेवाओं की क़ीमतों में 33,784 करोड़ रुपए की हेरफेर करने के मामले पकड़े गए। विदेशों से होने वाले व्यापारिक सौदों और धन के लेन-देन पर ख़ास ध्यान देने की वजह से 22,697 करोड़ रुपए का टैक्स वसूल किया गया।

  • राष्ट्रीय स्तर के तीन संस्थानों से कहा गया कि वे काले धन का अनुमान लगा कर सरकार को बताएं।

  • जर्मनी द्वारा मुहैया कराई गई जानकारी के आधार पर 18 लोगों की आमदनी को टैक्स के दायरे में लाया गया।

  • टैक्स चोरी के मामलों में हसन अली खान, मधु कोड़ा और बी. रामलिंगम राजू जैसी बड़ी हस्तियों के ख़िलाफ़ कार्रवई की गई।

  • प्रस्तावित 'डायरेक्ट टैक्स कोड' से विदेशी खातों के बारे में जानकरी देना अनिवार्य हो जाएगा और इस मामले में पारदर्षिता आएगी।

  • कई मौजूदा क़ानून और प्रस्तावित 'डायरेक्ट टैक्स कोड' में प्रावधान हैं कि अवैध धन पर वसूल किया जाने वाला टैक्स, ब्याज और दंड की रक़म उजागर हुए कुल काले धन से ज़्यादा भी हो सकती है। इसका मतलब है कि सामने आया काला धन पूरा-का-पूरा ज़ब्त किया जा सकता है।

  • 27 देशों से ऐसी संधियां की गई थीं, जो दोहरे कराधान से छूट देती हैं। इनमें स्विट्जरलैंड भी शामिल है। 10 देशों के साथ टैक्स-सूचना आदान-प्रदान संधि भी है।

  • मॉरिशस के साथ दोहरे कराधान में छूट देने वाले समझौते की समीक्षा की जा रही है।

  • आयकर विभाग में आपराधिक जांच निदेषालय का गठन किया गया है।

  • आयकर विभाग में सूचना आदान-प्रदान प्रकोष्ठ बनाया गया है।

  • भारत से अवैध तरीके से बाहर जाने वाले धन पर निग़ाह रखने के मक़सद से एक उच्च स्तरीय समन्वय समिति गठित की गई है, ताकि सरकार के विभिन्न विभागों और एजेंसियों के बीच सूचनाओं के आदान-प्रदान में तालमेल बना रहे।

  • काले धन को बाहर लाने के अलावा उसके उत्पन्न होने और विदेश भेजने पर रोकथाम के क़ानूनों को और कड़ा बनाने के लिए आठ सदस्यों वाली एक अन्य उच्चाधिकार प्राप्त समिति भी बनाई गई है।

15. भ्रष्टाचार और काले धन के खिलाफ़ कार्रवाई करना तो सचमुच ज़रूरी है, लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि किसी भी अच्छी सरकार के लिए सर्व-समाहित प्रगति, विकास, रोज़गार और ग़रीबी दूर करना सबसे प्रमुख लक्ष्य होने चाहिए। इसके अलावा कई और सामाजिक पहलू भी हैं, जैसे, स्त्री-पुरुषों को बराबर का हक़, अनवरत विकास, पर्यावरण सुरक्षा, वगैरह। यूपीए सरकार ने पिछले सात वर्षों में आम आदमी के हित में इन लक्ष्यों को पूरा करने के लिए ऐतिहासिक क़दम उठाए हैं। इनमें सूचना अधिकार क़ानून; महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी क़ानून; शिक्षा के अधिकार का क़ानून; प्राथमिक शिक्षा और आंगनवाड़ियों का सर्व-व्यापकीकरण; बुजुर्गों, विकलांगों और विधवाओं को पेंशन; स्वास्थ्य बीमा योजना; अनुसूचित जातियों, जनजातियों और अल्पसंख्यकों के लिए छात्रवृत्तियों की संख्या बढ़ाना; कृषि उत्पादों की खरीदी दर में बढ़ोतरी और खेती पर कर्ज के लिए कम ब्याज दर; जैसे कई काम शामिल हैं। अन्न सुरक्षा अधिकार क़ानून भी जल्दी ही लागू हो जाएगा।

16. यूपीए सरकार की नीतियों से अभूतपूर्व आर्थिक तरक्की हुई है। यूपीए-1 के पांच वर्षों में आर्थिक वृद्धि की दर हर साल औसतन साढ़े आठ प्रतिशत रही और यूपीए-2 के पहले दो वर्षों में, बावजूद इसके कि अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था बेहद प्रतिकूल थी, हमारी आर्थिक वृद्धि की दर सालाना औसतन 8.3 प्रतिशत रही है। इसी का नतीजा है कि राज्यों को कर वसूली से मिली रक़म में से उनके हिस्से, अनुदान और कर्ज़ के बतौर अच्छा-ख़ासा धन दिया जा सका। 2010-11 में सभी राज्यों को 4,45,916 करोड़ रुपए दिए गए; जब कि भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने अपने शासनकाल के अंतिम वर्ष, 2003-04 में, राज्यों को सिर्फ़ 1,46,305 करोड़ रुपए की रक़म दी थी। अब 2011-12 में राज्यों को दी जाने वाली रक़म 5,12,155 करोड़ रुपए होगी। कांग्रेस सामाजिक न्याय पर आधारित और ऊंची आर्थिक वृद्धि दर क़ायम रखने वाला सुशासन देने के लिए संकल्पित है।

17. कांग्रेस सांप्रदायिकता, धार्मिक कट्टरता और दक्षिणपंथी उग्रवाद के खतरों की तरफ़ भी जनता का ध्यान दिलाना चाहती है। यही तत्व हैं, जो आतंकवाद को बढ़ावा देने वाला माहौल बनाते हैं। इस खतरे की आशंका को देखते हुए ही कांग्रेस पार्टी ने चुनाव के मौक़े पर 'आतंकवाद से भारत की रक्षा' शीर्षक से ज़ारी अपने संकल्प-पत्र में कहा था : ''अगर हम हर तरह की सांप्रदायिकता से नहीं निपटेंगे तो आतंकवाद को कभी समाप्त नहीं कर पाएंगे।" मुम्बई पर आतंकवादी हमलों के बाद यूपीए-1 और यूपीए-2 ने सांप्रदायिकता और आतंकवाद का मुक़ाबला करने के लिए कई निर्णायक क़दम उठाए। गैरक़ानूनी गतिविधियों की रोकथाम के क़ानून में संशोधन किया गया। राष्ट्रीय जांच एजेंसी का गठन हुआ। मल्टी-एजेंसी केंद्र और पूरक केंद्र बने। ऐसे ही कई क़दम ज़ाहिर करते हैं कि हम सांप्रदायिकता और आतंकवाद के खतरों का सामना करने के संकल्प पर डटे रहेंगे। इन्हीं क़दमों का नतीजा है कि पिछले 30 महीनों में, पुणे को छोड़ कर, देश में कहीं भी आतंकवाद की कोई बड़ी घटना नहीं हुई है। सांप्रदायिक-आतंकवादी रवैया रखने वाले कई संगठनों को प्रतिबंधित किया गया है। सांप्रदायिक झगड़ों या आतंकवादी हमलों की साज़िश रचने वाले कई तत्वों को नाक़ाम किया गया है। कोई भी निष्पक्ष पर्यवेक्षक यह मानेगा कि पिछले 30 महीनों में भारत की आंतरिक और बाहरी सुरक्षा चुस्त-दुरुस्त हुई है।

18. सांप्रदायिक, कट्टरपंथी और उग्रवादी तत्व अलग-अलग दौर में अलग-अलग मुखौटे लगा लेते हैं। अपने दुष्ट मंसूबों को पूरा करने के लिए वे हर मौक़े का फ़ायदा उठाते हैं। वे हर मुद्दे का ढोल बजाने लगते हैं और हर आंदोलन में शामिल हो जाते हैं। आंदोलन या मुद्दा भले कितना ही संदिग्ध क्यों न हो, उन्हें तब तक कोई परवाह नहीं, जब तक राजनीतिक फ़ायदा मिलता रहे। दक्षिणपंथी उग्रवादी ताक़तें इस वक्+त दो कारणों से दबाव में हैं। पहला कारण यह है कि वे राजनीतिक ज+मीन खो चुकी हैं और चुनाव जीतने में असमर्थ हैं। और, दूसरा कारण यह है कि आतंकवादी गतिविधियों में उनकी भूमिका उजागर हो गई है और मालेगांव, मक्का मस्जिद और समझौता एक्सप्रेस जैसी कई घटनाओं में उन पर आरोप हैं।

19. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भारत को मध्यकालीन युग में वापस ले जाने के लिए बुने जा रहे जाल की जड़ में है। भाजपा, आरएसएस का राजनीतिक हथियार है। अपनी ख़ुराफ़ात को अंजाम देने के लिए आरएसएस ने कई अग्रिम संगठन बना रखे हैं। चुनावों के जरिए सत्ता हथियाने की आरएसएस और उसके सियासी औजारों की कोशिशें भले ही कितनी ही बार नाकाम हो जाएं, लेकिन वे अपनी प्रतिगामी और प्रतिक्रियावादी सोच देश पर थोपने के लिए हर तरकीब आजमाएंगे। लोकतांत्रिक संस्थाओं, चुनाव, निर्वाचित प्रतिनिधियों, संसद, सांसदों और संविधान की गरिमा को धूल में मिलाने की उनकी ताजा कोशिशें गैर-लोकतांत्रिक तरीक़ों से सत्ता पर काबिज़ होने की इस बड़ी व्यूह-रचना का ही हिस्सा हैं। कांग्रेस पार्टी और उसके लाखों कार्यकर्ताओं का फ़र्ज़ है कि इनसे सावधान रहने का संदेश देश के हर हिस्से में पहुचाएं।

देश को सुशासन चाहिए। हम यथास्थिति से संतुष्ट नहीं रह सकते हैं और हमेशा पहले से बेहतर काम कर सकते हैं। कांग्रेस आम आदमी की सेवा का अपना संकल्प नए सिरे से दोहराती है। कांग्रेस ने यूपीए-1 और यूपीए-2 में सुशासन देने का काम किया है और हम देशवासियों को लगातार बेहतर शासन व्यवस्था देने के लिए अपने को पुनर्संकल्पित करते हैं।


 


 

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