| स्वतंत्रता का संग्राम कांगे्रस स्थापना की पृष्ठभूमि आर्थिक और राजनीतिक असंतोष सैनिक क्रांति को कुचलकर भारत में ब्रिटिश साम्राज्य को बचा लिया गया। ईस्ट इंडिया कंपनी की खुल्लम- खुल्ला लूट का दौर समाप्त हो गया। महारानी विक्टोरिया को भारत की साम्राज्ञी घोषित किया गया और नई नीतियों का युग शुरू हआ। मोटे तौर पर कहा जाए तो सैनिक क्रांति वास्तव में नए पश्चिमी विचारकों, धार्मिक हस्तक्षेप और क्षीण होते हुए भारतीय सामंती सरदारों के खिलाफ विद्रोह था। इन नीतियों को समाप्त किया जाना था। लेकिन नई नीतियां वास्तव में अधिक प्रतिक्रियावादी और आगे चलकर पुरानी नीतियों के मुकाबले अधिक नुकसानदेह साबित हुईं। रियासती शासक ब्रिटिश सरकार के हाथों की कठपुतली बन गए, उन्हें विरोधी और प्रगतिशील ताकतों के खिलाफ ढाल के रूप इस्तेमाल किया गया। सरकार सामाजिक सुधारकों को बढ़ाया नहीं देती थी। अब मुख्य रूप से क्षीण होते हुए अत्याचारों, अंधविश्वासों और परम्परा विरोधी धार्मिक सिद्धांतों और संप्रदायों को सावधानीपूर्वक संरक्षण दिया जा रहा था। इन्हीं सब नीतियों से बाद में ब्रिटिश साम्राज्यवाद का स्वरूप विकसित हुआ और इसकी जड़ें धार्मिक मतभेदों, जातिप्रथा और अस्पृश्यता तथा सामंती राज्यों और आभिजात्य वर्ग के बीच गहरी पैठ गयी थीं। लेकिन आर्थिक शोषण की नीति ने और विकराल लेकिन सूक्ष्म स्वरूप ग्रहण कर लिया। बढ़ती हुई गरीबी और किसानों की बेबसी के परिणामस्वरूप व्यापक जनसंतोष उभरना लाजि+मी था। आम जनता हिन्दुओं और मुसलमानों ने जहां कहीं संभव हुआ हर संभव तीरकों से इस भीषण दमन के इस भीषण दमन के खिलाफ संघर्ष किया। एक नई अंगे्रजी शिक्षा व्यवस्था में शिक्षित वर्ग सरकारी कामकाज चला रहा था। हर पश्चिमी चीज के समर्थक सरकार को पूर्ण सहयोग दे रहे थे। लेकिन उनकी इस दासता ने जल्दी ही उन्हें अपनी असली स्थिति का अहसास करा दिया। उन्हें सैनिक पदों और सरकार में ऊंचे पदों से अलग-थलग कर दिया गया। लेकिन एक तरफ अकाल की स्थिति और दूसरी तरफ सरकार के अंधाधुंध खर्च और भारत के उद्योगों और खुशहाली के सुनियोजित विनाश का भान होने में बहुत अधिक समय नहीं लगा। भारत के मूल निवासियों के प्रति अंग्रेजी के कटु व्यवहार से यह निराशा और फैली और इस अपमान को बड़े पैमाने पर अनुभव किया जा रहा था। सरकार के विभिन्न कार्यों से, उदारवादी सोच और संस्थाओं की अंग्रेजी परंपरा में शिक्षित वर्गों की आस्था को ठेस पहुंची। मैटकाफ ने प्रेस की आजादी की जो प्रथा शुरू की थी उसे समाप्त कर दिया गया। 1878 में स्वदेशी प्रेस पर प्रतिबंध लगा दिया गया और बंगला की अमृत बाजार पत्रिका को रातों रात अंगे्रजी बाना पहनना पड़ा। 1879 में शस्त्र अधिनियम पास किया गया। यह निराशा तब और भी बढ़ गयी जब जातीय भेद के आधार पर न्यायिक भेदभाव समाप्त करने के इलबर्ट विधेयक को यूरोपीय समुदाय और सिविल सेवाओं के कडे+ विरोध के कारण बीच में ही छोड़ दिया गया। यूरोप के लोग वायसराय लार्ड रिपन को यह धमकी देने से भी नहीं हिचके कि अगर यह विधेयक पास किया गया तो बडे+ पैमाने पर हिंसा होगी। इससे भारतीयों ने एक ऐसा सब सीखा जिसे भुलाया नहीं जा सकता। 1853 में पहली सूती कपड़ा मिल की स्थापना बम्बई में की गयी। 1880 तक इन मिलों की संख्या 156 हो गयी। इस दिशा में बड़ी तेजी से प्रगति हुई और लंकाशायर के दबाव में आकर 1882 में भारत में कपास का आयात पर लगे सभी शुल्क पूरी तरह हटा लिए गए। सामाजिक पुनर्जागरण : कांगे्रस का जन्म सिर्फ आर्थिक शोषण और राजनीतिक दासता के कारण ही नहीं हुआ। इसमें संदेह नहीं की कि कांगे्रस के राजनीतिक लक्ष्य भी थे लेकिन वह राष्ट्रीय पुनर्जागरण आंदोलन का अंग और अभिव्यक्ति मंच भी बन गयी थी। कांगे्रस के जन्म से पचास साल से भी पहले से राष्ट्रीय पुनर्जागरण की शक्तियां काम कर रही थीं। वास्तव में राजा राम मोहन राय के समय से ही राजनीतिक जीवन में सुगबुगाहट शुरू हो गयी थी। एक तरह से राममोहन राय को भारतीय राष्ट्रवाद का मसीहा और आधुनिक भारत का जनक माना जाता है। उनका दृष्टिकोण बहुत व्यापक था और वे सच्चे अर्थों में युगद्रष्टा थे। यह सही है कि अपनी सुधारवादी गतिविधियों में उन्होंने सबसे अधिक ध्यान अपने समय की सामाजिक आर्थिक परिस्थितियों पर दिया। लेकिन उन्हें अपने समय में देश पर हो रही भयंकर राजनीतिक ज्यादतियों का पूरा एहसास था और उन्होंने इन ज्यादतियों से जल्दी से जल्दी मुक्ति पाने के लिए अथक संषर्घ किया। 1776 में जन्मे राममोहन राय का निधन 1833 में ब्रिस्टल में हुआ। उनका नाम भारत के दो प्रमुख सामाजिक सुधारों से जुड़ा हुआ है। यह है सतीप्रथा का अन्त, और देश में पश्चिमी शिक्षा की शुरूआत। अपने जीवन के अंतिम दिनों में वे इंग्लैंड गये। आजादी के लिए उनकी तड़प इतनी अधिक थी कि उत्तमाशा अन्तरीप पहुंचाने पर उन्होंने आग्रह किया कि उन्हें फ्रांस के उस जहाज पर ले जाया जाए जिस पर उन्होंने आजादी का ध्वज फहराता देखा था ताकि वे उस ध्वज के प्रति सम्मान व्यक्त कर सकें। ध्वज को देखते ही वे चिल्ला पड़े, ''ध्वज ही जय हो'', ''जय हो'' यद्यपि वे इंग्लैंड मूल रूप से मुगल सम्राट के दूत के रूप में लंदन में उसके हितों की वकालत करने गये थे लेकिन हाउस आफ कामन्स की समिति के समक्ष भारतीयों की कुछ ज्वलंत समस्याओं का उल्लेख करने से नहीं चुके। उन्होंने भारत की राजस्व व्यवस्था, भारत की न्यायिक व्यवस्था और भारतीय माल की स्थिति के बारे में तीन पत्र समिति में पेश किए। ईस्ट इंडिया कम्पनी ने उनके सम्मान में सार्वजनिक रूप से रात्रिभोज का आयोजन किया। 1832 में जब ब्रिटिश संसद में चार्टर कानून पर विचार हो रहा था तो उन्होंने कसम खाई कि यदि यह विधेयक पास न हुआ तो वे ब्रिटिश उपनिवेश छोड़कर अमरीका में रहने लगेंगे। 1858 में भारत में विश्वविद्यालयों की स्थापना की गयी तथा 1861 और 1863 के बीच उच्च न्यायालय और विधान परिषदें कायम की गयीं। सैनिक क्रांति से कुछ ही दिन पहले ÷विधवा पुनर्विवाह कानून÷ और ईसाई धर्म स्वीकार करने से सम्बद्ध कानून पास किए गए। 1860 के दशक में पश्चिमी शिक्षा और साहित्य में निकट सम्पर्क कायम हुआ। पश्चिमी कानूनी और संसदीय प्रक्रियाएं अपनाये जाने से कानून और विधान के क्षेत्र में नए युग का सूत्रापात हुआ। पूर्व पर पश्चिमी सभ्यता के प्रभाव ने भारतीय जनता के विश्वासों और भावनाओं पर गहरा असर डाला। केवल बंगाल, बम्बई और मद्रास प्रांतों में ही आधुनिक पद्धति पर थोड़ी बहुत शिक्षा उपलब्ध हुई। इस प्रांतों में भी शिक्षित लोगों की संख्या बहुत कम थी। सैनिक क्रांति के बाद की परिस्थितियों में इन शिक्षित लोगों को अपनी महत्वकाक्षाएं पूरी करने का काफी अवसर मिला। इन लोगों ने अपने अंगे्रज आकाओं की तरह सोचना शुरू कर दिया और पश्चिमी से आने वाली हर चीज का समर्थन और अनुसरण किया। अंगे्रजों के अंधानुकरण का यह दौर बंगाल में विशेष रूप से मुखर था। लेकिन जल्दी ही इस प्रक्रिया का विरोध होने लगा और यह विरोध कई रूपों में सामने आया। कभी पश्चिमी और पूर्व के समन्वय के रूप में और कभी अतीत को वापस लौटते पुनर्जागरण के रूप में। राममोहन राय के जीवन काल में बोए गए धार्मिक सुधारकों के बीज फलित होने लगे। राममोहन राय के उत्तराधिकारी केशव चन्द्र सेन ने ब्रह्म समाज का दूर- दूर तक प्रचार किया और उसके सिद्धांतों को नई समाजोपयोगी दिशा दी। उन्होंने आत्म संयम आंदोलन पर ध्यान केंद्रित किया और इंग्लैंड के सुधारकों का समर्थन किया। 1872 में कानूनी विवाह अधिनियम-3 पास कराने में उनका काफी बड़ा हाथ था। बंगाल में ब्रह्म समाज के प्रसार का पूरे देश पर असर पड़ा। पूना में इस आंदोलन में एम.जी. रानाडे के नेतृत्व में प्रार्थना समाज बना। एम.जी. रानाडे को समाज सुधार आंदोलन के प्रणेता के रूप में याद किया जाता रहेगा। यह आंदोलन लम्बे समय तक कांगे्रस से जुड़ा रहा। इस सुधारवादी आंदोलन की एक प्रमुख विशेषता यह थी कि यह अतीत की परंपराओं और देश में सदियों से चले आ रहे विश्वासों और मान्यताओं का विरोधी था। विरोध की यह भावना पश्चिमी संस्थाओं की अनावश्यक चकाचौंध से जन्मी थी और इससे जुड़ी हुई राजनीतिक महत्वाकांक्षा ने इसे और प्रखर बना दिया। राष्ट्र की पारम्परिक मान्यताओं की विरोध की इस प्रवृत्ति का सुधारवादी आंदोलनों द्वारा विरोध होना स्वाभाविक ही था। उत्तर पश्चिम में स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा स्थापित आर्य समाज और दक्षिण में थियोसोफिकल आंदोलन ने पश्चिमी शिक्षा और आचार के साथ आयी पाखंड और धर्मान्धता की भावना को पनपने से रोकने के लिए दीवार का काम किया। यह दोनों ही आंदोलन घोर राष्ट्रवादी थे। केवल दयानन्द सरस्वती की प्रेरणा से जन्में आर्य समाज का राष्ट्रवाद कुछ अधिक प्रखर था। आर्य समाज ने वेदों और वैदिक संस्कृति की श्रेष्ठता और आमोघता का प्रचार तो किया लेकिन साथ ही वह व्यापक सामाजिक सुधारकों का हिमायती नहीं था। इस प्रकार उसने राष्ट्र में एक प्रबल पौरुष की भावना पैदा की जो उसकी विरासत और वातावरण के सर्वोत्तम समन्वय का प्रतीक थी। उसने हिन्दू धर्म के धार्मिक अंधविश्वासों और उस समय की सामाजिक बुराइयों के खिलाफ उसी तरह से संघर्ष किया जैसे ब्रह्म समाज ने बहुदेववाद, मूर्तिपूजा और बहुपत्नी प्रथा के खिलाफ संघर्ष किया था। थियोसोफिकल आंदोलन ने अपने अध्ययन और सहानुभूति का क्षेत्र तो विश्व व्यापी रखा लेकिन पूर्व की संस्कृति की शानदार और महान परम्पराओं की पुनर्स्थापना पर विशेष जोर दिया। इसी भावना से प्रेरित होकर श्रीमती एनीबेसेंट ने भारत के तीर्थ स्थल बनारस में एक कालेज की स्थापना की। थियोसोफिकल आंदोलन की गतिविधियों ने अंतर्राष्ट्रीय भाईचारे की भावना को बलवती करने के साथ- साथ पश्चिम की तार्किक श्रेष्ठता पर अंकुश लगाने में भी मदद की और भारत में एक नया सांस्कृतिक केंद्र विकसित किया जिसने पश्चिम के विद्वानों और पंडितों को एक बार फिर इस प्राचीन देश की ओर आकृष्ट किया। भारत में कांगे्रस के जन्म से पहले राष्ट्रीय पुनर्जागरण का ताजा चरण महान् संत रामकृष्ण परमहंस के नेतृत्व में बंगाल में शुरू हुआ। स्वामी रामकृष्ण ने बाद में स्वामी विवेकानन्द के माध्यम से पूर्व और पश्चिम तक अपना संदेश पहुंचाया। रामकृष्ण मिशन केवल एक ओर तंत्र मंत्र और दूसरी ओर यथार्थवाद से जुड़ा संगठन नहीं है, बल्कि यह गहन अतर्ज्ञानवाद से जुड़ा था जो लोक संघर्ष या समाजसेवा के सर्वोच्च कर्तव्य से कभी विमुख नहीं हुआ। अमरीका में ÷तूफानी हिन्दू' के नाम से मशहूर स्वामी विवेकानन्द ने अमरीका, यूरोप, मिस्र, चीन और जापान में केवल भारत का संदेश ही नहीं पहुंचाया बल्कि वे स्वयं भी पश्चिम की संस्कृति से बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने भारत में हिमालय से कन्याकुमारी तक पुनरुद्धार का नया संदेश दिया। उन्होंने मुक्ति और समानता के साथ-साथ जन-जागरण का विशेष जोर दिया। वे पश्चिमी की प्रगति और भारत के आध्यात्म का समन्वय चाहते थे। उनके भाषणों और लेखों का एक ही मूल मंत्र था ÷÷निडर और मजबूत बनो क्योंकि कमजोरी पाप है। मृत्यु का द्वार है।'÷ विवेकानन्द के समकालीन लेकिन उनसे बहुत बाद की पीढ़ी के प्रतिनिधि थे रवीन्द्र नाथ टैगोर। टैगोर परिवार ने 19वीं सदी में बंगाल में अनेक सुधारवादी आंदोलनों में प्रमुख भूमिका निभाई। इस परिवार ने देश को अनेक आध्यात्मिक नेता और कलाकार दिए। भारत के मानस पर टैगोर का प्रभाव और उसके साहित्य, कविता, नाटक, संगीत, सामाजिक और शैक्षिक पुनर्निर्माण तथा राजनीतिक विचारधारा पर टैगोर की छाप का सौंदर्य और गहनता अभूतपूर्व है। यह छाप मानव के व्यक्तित्व और मस्तिष्क का ऐसा अद्भुत उदाहरण है जो भावी पीढ़ियों को प्रभावित करता रहेगा और नए रंग देगा। वास्तव में टैगोर का योगदान पूर्व और पश्चिम, आधुनिक और प्राचीन तथा देश में उभरते राष्ट्रवाद तथा अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के बीच का अद्भुत समन्वय है। ये धाराएं और आंदोलन वास्तव में नई राष्ट्रीय चेतना और उमंग के प्राण थे और यही धीरे-धीरे कदम-दर-कदम आगे चलकर भारतीय राष्ट्रीय कांगे्रस के रूप में साकार हुए। अखिल भारतीय संगठन का विचार : कांगे्रस के जन्म का श्रेय अक्सर एलेन आक्टोवियन ह्यूम को दिया जाता है जिन्होंने वायसराय लार्ड डफरिन के आशीर्वाद से इसकी शुरूआत की थी। इस प्रकार अंगे्रजों को भारतीय राष्ट्रवाद दत्तक जनक माना जाता है। यह सच है कि ह्यूम 1885 में हुए कांगे्रस अधिवेशन के संयोजक थे। लेकिन आगे चलकर यह स्पष्ट हो गया कि वास्तव में कांगे्रस देश में पनप रही विभिन्न राजनीतिक, आर्थिक और सामािजक ताकतों का अपरिहार्य परिणति थी। ब्रिटिश प्रशासकों का अधिक जागरूक वर्ग देश में बढ़ते हुए अंसतोष से अनभिज्ञ नहीं था। उस समय एक लापरवाह अफसरशाही सरकार एक ओर मिथ्यावादी बजट के जीर्ण-शीर्ण खंडों और दूसरी ओर विशाल जनसंख्या के दहकते हुए ज्वालामुख पर थरथराती बैठी थी। श्री ह्यूम ने इस बात के ढेरों प्रमाण इकट्ठे किए कि देश की भूखी और हताश जनसंख्या द्वारा क्रांति अवश्यम्भावी है। उन्होंने इस लाकप्रिय आवेग को अहानिकारक धारा की दिशा में मोड़ने के तरीकों और उपायों को खोजने की कोशिश की। उन्होंने 1 मार्च 1883 को कलकत्ता विश्वविद्यालय के स्नातकों को एक पत्र लिखा और अखिल भारतीय स्तर पर संविधान संगत आंदोलन चलाने के लिए 1884 में इंडियन नेशनल यूनियन का गठन किया जिसकी बैठक बाद में पूना में होनी थी। शुरू-शुरू में सरकार ने इस संगठन को संरक्षण दिया लेकिन बाद में उसे महसूस हुआ कि संगठन उसके हाथों से निकलता जा रहा है और यह संरक्षण वापस ले लिया गया। बाद में इस संगठन को ÷राष्ट्रद्रोह का कारखाना' कहा गया और लार्ड डफरिन ने तो इसे भारतीय जनसंख्या की बहुत छोटी सी अल्पसंख्या का प्रतिनिधि बताया। बाद में बंगाल में इंडियन एसोसिएशन और पूना में रानाडे के नेतृत्व में सार्वजनिक सभा तथा मद्रास में महाजनसभा जैसी लोकप्रिय संस्थाएं बनीं। 1877 और उसके बाद के वर्षों में सुरेन्द्र नाथ बनर्जी ने भारतीय होम रूल और उस समय के राजनीतिक प्रश्नों के मामलेपर जनमत तैयार करने के लिए संपूर्ण भारत की यात्रा की। 1877 में उन्होंने दिल्ली दरबार में भाग लिया और वहीं पहली बार अखिल भारतीय स्तर पर राजनीतिक संगठन के निर्माण का विचार फूटा। दिसम्बर 1884 में मद्रास में थियासोफिकल सोसायटी का वार्षिक सम्मेलन हुआ जिसमें कुछ प्रमुख राजनेताओं ने अखिल भारतीय स्तर पर राष्ट्रीय आंदोलन शुरू करने का फैसला किया। इस प्रकार सरकार द्वारा राष्ट्रीय कांग्रेस के गठन की पहल करने और श्रेय लेने तथा उसे अपने नियंत्रण में रखने का रास्ता तैयार हुआ। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अविर्भाव एच0 ओ0 मित्तल भारत के इतिहास में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का स्थान बेजोड़ है। इस संस्था में ब्रिटिश शासन से मुक्ति पाने के लिए 60 साल से भी अधिक समय तक अविराम संघर्ष किया है। डा0 पट्टाभिसीतारामैया ने ठीक ही कहा था, ÷÷कांग्रेस का इतिहास वास्तव में भारत की स्वतंत्रता का इतिहास है।÷÷ सन 1885 में इसकी स्थापना इसलिए की गयी थी कि जनता को ब्रिटिश राज के विरुद्ध असंतोष से राहत दिलाई जाये। इसकी स्थापना एक अंग्रेज सेवा निवृत्त अधिकारी श्री ए0 ओ0 ह्यूम की सहायता से की गई थी। वे उदार नेता थे। निम्न वर्ग में, विशेष रूप से किसानों में बढ़ती हुई अराजकता और असंतोष से वे विचलित हो गये थे। उन्हें यह आशंका थी कि यह असंतोष शिक्षित वर्ग को भी ग्रस लेगा। इस प्रकार श्री ए0 ओ0 ह्यूम ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना के विषय में सोचा ताकि यह संस्था अखिल भारतीय स्तर की बने जिसमें शिक्षित वर्ग के उत्साह तथा विवेक को संवैधानिक रूप से काम करने की दिशा मिले। इसमें संदेह नहीं कि श्री ह्यूम ने कांग्रेस की स्थापना में यथेष्ट प्रयत्न किया परंतु उन्हीं दिनों श्री सुरेन्द्र नाथ बनर्जी, सर जमशेद जी, श्री विश्वनाथ मांडलिक और दादा भाई नौरोजी ने भी इसी तरह से संगठन की स्थापना के बारे में सोचा। 1877 में दिल्ली दरबार हुआ था तब इन महानुभावों ने आपस में कहा, ÷÷अगर देश के राजा और उच्च वर्ग के लोगों को स्वेच्छाचारी वायसराय की शान-शौकत बढ़ाने के उद्देश्य से इकट्ठा होने पर मजबूर किया जा सकता है तो आप लोगों को संवैधानिक तरीकों से स्वेच्छाचारी शसन के तौर-तरीकों को रोकने के लिए क्यों नहीं इकट्ठा होने दिया जा सकता। लेकिन यह विचार सन 1885 तक अमल में नहीं लाया जा सका। पूर्ववर्ती संगठन 1. भूमि संबंधी संगठन क. सन् 1837 में बंगाल में जमींदारी एसोसियेशन की स्थापना से भारत की संवैधानिक राजनीति का सूत्रपात हुआ। श्री प्रसन्न कुमार टैगोर इसके प्रमुख सदस्य थे। पहले तो यह संस्था केवल जमींदारों के हितों के लिए काम करती थी लेकिन बाद में इसकी गतिविधियों में आम लोगों के हितों को भी शामिल कर लिया गया। ख. सन 1843 में बंगाल ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी की स्थापना हुई। इसे कलकत्ता के प्रमुख व्यापारी रामगोपाल घोष ने जमींदारों के लिए ही स्थापित किया था। इस संस्था का उद्देश्य ब्रिटिश भारत के लोगों की वास्तविक हालत, देश के कानूनों, संस्थानों और साधनों से संबंधित सूचनाओं को एकत्र और प्रसारित करना था और ऐसे शान्तिपूर्ण और वैध तरीके अपनाने थे जिनसे देशवासियों के सभी वर्गों के हितों का कल्याण हो सके, उन्हें उचित अधिकार मिल सके और उनके हितों को बढ़ावा दिया जा सके। ग. सन 1851 में ब्रिटिश इंडिया एसोसियेशन की स्थापना हुई थी यह केवल जमींदारों का ही भारतीय संगठन था। इस संगठन में उपर्युक्त दोनों संगठनों का विलय कर दिया गया था यह शिक्षित जमींदारों का संगठन था और इसके प्रथम अध्यक्ष थे राजा राधाकांत बहादुर। यह पहला राजनीतिक संगठन था जिसका एक निश्चित ध्येय था और इसकी प्राप्ति के लिए उसने तरीके अपनाये। इस संस्था की पहली सालाना रिपोर्ट में कहा गया है कि इसका उद्देश्य देश के स्थानीय प्रशासन में और पार्लियामेंट द्वारा निहित सरकारी प्रणाली में सुधार लाना था। इसका महत्व इस बात में है कि राजनीतिक दलों की स्थापना के पहले इस संगठन ने ब्रिटिश सरकार और भारतीय समाज के बीच संपर्क सूत्र का काम किया। 2. मध्यवर्गीय नागरिक संगठन 2 अप्रैल, 1670 को सतारा के औंध, पंत प्रतिनिधि के तत्वाधान में सार्वजनिक सभा की स्थापना हुई। इस सभा का उद्देश्य दक्षिण के और देश के अन्य भागों के लोगों की राजनीतिक भलाई और हितों को बढ़ावा देना था। श्री एम. जी. रानाडे ने सार्वजनिक सभा की स्थापना में भी दल का नेतृत्व किया, उन्होंने प्रार्थना समाज की स्थापना तथा विधवा, पुर्नविवाह संस्था कायम करने में भाग लिया था। यह ध्यान देने योग्य बात है कि यह संस्था प्रस्ताव पारित करने वाली राजनीतिक संस्था मान्य नहीं थी। इस संस्था ने और भी जन-कल्याण के काम किये जैसे कि 1870-75 की पांच वर्ष की अवधि में महाराष्ट्र में सूखा पड़ा उन दिनों इस संस्था ने किसानों की समस्याओं को सुलझाने की कोशिश की। यह संस्था हर साल कलकत्ता को प्रतिनिधि भेजपा करती थी और राहत दिलाती थी। इंडियन एसोसियेशन (भारतीय संस्था) भी एक प्रकार की मध्यवर्गीय लोगों का संगठन था। इसकी स्थापना 23 जुलाई, 1873 में हुई थी। यह राजनीतिक संगठन था। इसके मुख्य संयोजक श्री सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने इस संबंध में कहा था कि ÷÷इस पर मध्यवर्गीय लोगों का ध्यान केंद्रित हुआ और यह बंगाल के शिक्षित समुदाय के प्रमुख प्रतिनिधियों का केंद्र बन गया।÷÷ इसने घोषणा की कि इस संगठन का उद्देश्य सरकार के सामने लोगों का प्रतिनिधित्व करना था और ऐसे जनमत को तैयार करने में सहायता देना था ताकि उससे साझे राजनीतिक हितों के लिए विभिन्न भारतीय जातियों में एकता लाई जा सके। इसकी गतिविधियां केवल बंगाल तक ही सीमित थीं। फिर भी इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि इससे ही बाद में अखिल भारतीय संगठन के निर्माण की पृष्ठभूमि तैयार हुई। भारतीय संगठन जैसे कुछ और राजनीतिक संगठन भी बने। दो अन्य प्रान्तों में इस प्रकार के संगठन बने। ये थे मद्रास में महाजन सभा और बंबई प्रेसीडेन्सी एसोसिएशन। मद्रास की महाजन सभा को ÷हिन्दू÷ पत्र तथा अन्य अनेक नेताओं जैसे श्री आनंद चार्लू, श्री रंगीच नायडू तथा श्री सुब्रमनिया एअर का समर्थन प्राप्त था। श्री फिरोज शाह मेहता, श्री के0 टी0 तैलंग और तैयब जी जैसे लोग प्रेसीडेन्सी ऐसोसियशन को समर्थन दे रहे थे। ये सभी मध्यवर्गीय संगठन न केवल स्वतंत्रता चाहते थे बल्कि समानता या यों कहिए ÷÷एक प्रकार की साझेदारी÷÷ चाहते थे। उन्होंने ऐसे सभी अधिनियमों को समाप्त करने की मांग की जिनमें यूरोपवासियों और भारतवासियों के बीच भेद-भाव की बू आती थी। ऐसा ही एक अधिनियम था ÷÷आर्म्स ऐक्ट÷÷। इस प्रकार की सभी मांगों का समान उद्देश्य यही था कि अंग्रेज और हिन्दुस्तानी का भेद-भाव समाप्त हो, राज्यों में समानता द्वारा देश के प्रशासन में जातीय आधार को समाप्त कर दिया जाये। ऊपर बतायी गई सभी संस्थाओं में ये भारी कमी थी। इनका आधार प्रान्तीय था और ये सदस्यता तथा दृष्टिकोण में भी प्रान्तीय थीं। जरूरत तो उस समय एक अखिल भारतीय संगठन की थी जो बड़े पैमाने पर लोगों को संगठित कर सके। यहां पर बताना प्रासंगिक होगा कि इल्बर्ट बिल पर जो विवाद खड़ा हुआ उससे एक और बड़े ऐसे संगठन की आवश्यकता महसूस हुई जो एंग्लो-इंडियन की चुनौतियों का भी सामना कर सके। इस संबंध में श्री सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने पहल की, जिसके परिणाम स्वरूप सन 1883 में कलकत्ता के अलबर्ट हाल में एक राजनीतिक सम्मेलन आयोजित किया गया। इस सम्मेलन में देश के विभिन्न भागों से आने वाले प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इसकी अध्यक्षता श्री आनंदमोहन घोष ने की। उन्होंने इसे ÷÷राष्ट्रीय संसद की ओर से ÷पहल कदम÷÷ की संज्ञा दी। श्री एस0 एन0 बनर्जी ने अपने उद्घाटन भाषण में दिल्ली सम्मेलन का विशेष रूप से हवाला दिया और बताया कि सब के हितों के लिए काम करने वाली राजनीतिक संस्था का यह एक प्रकार का नमूना है। श्री अम्बिकाचरण मजूमदार ने कहा था, ÷÷यह अनुपम दृष्य था। लेखक के मन पर उस अत्यधिक उत्साह और निष्ठा की स्पष्ट छाप है जो कि इस सम्मेलन के त्रिदिवसीय सम्मेलन में देखने को मिली। सम्मेलन के अंत में हर आदमी जो वहां मौजूद था एक नयी ज्योति तथा उत्साह से अनुप्राणित हुआ।÷÷ इस सममेलन ने कोई प्रस्ताव पारित नहीं किया। बाद वाले वर्षों में प्रदत्त जारी रहे और श्री ए0 ओ0 ह्यूम ने इस दिशा में पहल की। मार्च 1885 में पहली सूचना जिस में आगामी दिसम्बर में पूना में पहली भारतीय राष्ट्रीय संघ की बैठक के बारे में बताया गया था। इस प्रकार इंडियन राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना हुई। उल्लेखनीय है कि तत्कालीन वायसराय लार्ड उफरिन ने भी श्री ह्यूम की योजना में उनकी दिलचस्पी एक राजनीतिक संगठन के रूप में थी जो संगठन औपनिवेशिक प्रणाली की एक कमी को पूरा कर पाता। उन की इच्छा थी कि औपनिवेशिक प्रणाली में एक वफादार विपक्ष हो और ऐसी भूमिका कांग्रेस ने अपनी स्थापना के बाद कुछ समय तक निभाई। केवल राजनीतिक शक्तियों और भावना से ही कांग्रेस का जन्म हुआ। इसमें संदेह नहीं, कांग्रेस के कुछ राजनीतिक उद्देश्य थे और यह भी सच है कि इसकी स्थापना के पीछे राष्ट्रीय पुनर्जागरण का आन्दोलन था। इस संबंध में डा0 पट्टाभिसीतारमैया ने कहा है, ÷÷कांग्रेस की स्थापना से पहले पचास साल से भी अधिक समय तक राष्ट्रीय पुनर्जागरण का अभियान क्रियाशील रहा।÷÷ उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में जब राष्ट्रीयता का उदय हुआ, तभी औपनिवेशिक राज्य से स्वतंत्र राष्ट्र के विचार की प्रक्रिया शुरू हुई। इस अवधि में सामाजिक सुधार तथा सांस्कृतिक राष्ट्रीयता की प्रक्रिया भी शुरू हुई और इस का परिणाम हुआ लोगों में चेतना का आविर्भाव। यह ध्यान देने की बात है कि उन दिनों अनेक धार्मिक तथा सामाजिक सुधारकों ने कई सामाजिक धार्मिक आन्दोलन चलाये थे और इसी का परिणाम हमें इस राष्ट्रीय चेतना में देखने को मिला। ÷÷ईस्ट इंडिया कंपनी ने जो जड़ता की स्थिति पैदा की थी उस स्थिति से राजाराममोहन राय के सुधार आन्दोलन ने बंगाल को उबारा। उनके द्वारा स्थापित ब्रह्म समाज ने सुधार के रूप में इतनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की कि उसे ÷÷नये युग का उद्घोषक÷÷ कहा जाता है। स्वामी दयानंद का आर्य समाज भी इतना ही महत्वपूर्ण था। इस की स्थापना सन 1875 में की गई थी। इस समाज ने धार्मिक बुराइयों और सामाजिक कट्टरता पर प्रहार किये। उन्होंने आर्य समाज को स्वराज्य का मंत्र दिया जिससे आर्य समाज राष्ट्रीय संस्था के रूप में उभरा। उन्नीसवीं सदी का दूसरा अद्भुत धार्मिक संगठन था - रामकृष्ण मिशन। इस मिशन ने राजनीति को अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित किया। इस संगठन ने राष्ट्रीय जागरुकता का संचार किया और लोगों को बताया कि पश्चिम का अनुकरण करने की कोई आवश्यकता नहीं है। एक और आन्दोलन ÷÷सोशल रिफार्म मूवमेंट÷÷ (सामाजिक सुधार आन्दोलन) ने भी राष्ट्रीय पुनर्जागरण में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। और आंदोलन की भांति, इस आंदोलन का अगुवा भी बंगाल ही था। इस आंदोलन के स्तंभ थे श्री शशिपाद बनर्जी। अंधविश्वासों तथा अन्य धार्मिक-सामाजिक बुराइयों के विरुद्ध लड़ाई में इन सभी सामाजिक और धार्मिक संस्थाओं ने बहुत महत्वपूर्ण तथा प्रगतिशील भूमिका अदा की। इन संस्थाओं ने देशभक्ति की भावना का संचार किया और राष्ट्रीय चेतना पर इसका निश्चित प्रभाव पड़ा। ऐसी परिस्थितियों में राष्ट्रीय कांग्रेस का विचार पैदा हुआ अंत में, यह कहा जा सकता है कि सामाजिक- राजनीतिक धार्मिक घटनाओं को परस्पर तालमेल के फलस्वरूप भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का जन्म हुआ। वस्तुतः इसकी स्थापना का श्रेय भारतीय नरम वर्ग को भी उतना ही है जितना कि सरकार को। दोनों के हितों में समानता थी। भारतीयों और शासकों दोनों के लिए ही यह समय की पुकार थी। कांग्रेस का जन्म पूर्व परिस्थिति की पृष्ठभूमि डा0 पट्टामि सीतारामैया कांग्रेस का इतिहास सच पूछो तो उस लड़ाई का इतिहास है जो हिन्दुस्तान ने अपनी आजादी के लिए लड़ी है। कई सदियों से भारतीय राष्ट्र विदेशियों का गुलाम बना रहा। गुलामी का आरंभ भारतवर्ष में एक व्यापारी-कंपनी के पदार्पण करने के साथ हुआ है। पूर्व परिस्थिति ईस्ट इण्डिया कंपनी का व्यापारिक और राजनीतिक दौर-दौरा भारत में कोई सौ वर्षों तक रहा। इसी बीच उसने भारत में बड़े-बड़े हिस्सों पर अपना कब्जा कर लिया और व्यापारी की जगह अब एक राजशक्ति बन गई। 1772 के बाद ब्रिटिश-पार्लमेण्ट समय-समय पर उसके कामों की जांच-पड़ताल करने लगी और जब-जब उसको नया चार्टर (सनद) दिया जाता, तब-तब पहले ब्रिटिश-सरकार की तरफ से उसके कामों की जांच कर ली जाती थी। चूंकि उसका व्यापारिक कार्य पीछे पड़ता जा रहा था, यह जांच-पड़ताल और भी बारीकी के साथ होने लगी। परंतु इससे यह ख्याल करना तो ठीक न होगा कि उसके काम पर कोई गहरी देख-रेख की जाती रही हो। हां, ऐसे ब्रिटिश लोग जरूर थे जो भारतीय प्रश्नों का गहराई के साथ अध्ययन करते थे। वे कंपनी के कार्य और कार्यक्रम को गौर से और आंखे खोलकर देखा करते थे और उसे पार्लमेण्ट की निगाह से गुजारने में किसी तरह शिथिल नहीं रहते थे। 18वीं सदी के चौथे चरण में एडमण्ड और बर्क, शेरिडन और फॉक्स नामक सज्जनों ने इस विषय में बड़ी दिलचस्पी ली। उससे कंपनी के ऐजेण्टो के कारनामों की ओर लोगों का ध्यान खिंच गया। हालांकि वारन् हेस्ंिटग्स पर चलाए गए मुकदमे का उद्देश्य पूरा न हुआ, फिर भी उसने कंपनी के अन्याय-अत्याचार को लोगों की निगाह में ला दिया। नया चार्टर देने के पहले जब-जब जांच-पड़ताल की गई, तब- तब उसके फलस्वरूप दूरगामी परिणाम लाने वाले कुछ-न-कुछ सिद्धान्तों का निरूपण तो जरूर किया गया, परंतु वे सिर्फ कागज में ही लिखे रह जाते थे। कई बार यह नीति निश्चित की गई कि कंपनी के एजेण्ट अपने-अपने इलाकों की सीमा बढ़ाने की कोशिश न करें, परंतु हर बार कोई-न-कोई ऐसा मौका आ जाता था या पैदा कर लिया जाता था कि जिससे इस आदेश का पालन न होता था और उनके इलाके की सीमा बढ़ती ही चली गई। यहां उस इतिहास में प्रवेश करने की जरूरत नहीं है, जो ईस्ट इण्डिया कंपनी की तरफ से भारत को हथियाते समय की गई दगाबाजियों और काली करतूतों से भरा हुआ है, जिसमें क्षुद्र और लोभी मानव प्रकृति ने अपना रंग खूब दिखाया है और जिसमें सन्धियां और शर्तनामे कदम-कदम पर तोड़े गए हैं; और न यहां इसी बात की जरूरत है कि कुछ लोगों ने जो आपस में दगाबाजियां और नमकहरामियां की हैं, उनका वर्णन किया जाए; न कंपनी के एजेण्टों के द्वारा काम में लाए गए उन साधनों और तदबीरों पर विचार करने की जरूरत है, जिनके बल पर उन्होंने न सिर्फ कंपनी और उसके डाइरेक्टरों को मालामाल कर दिया, बल्कि खुद अपनी जेबें भी भर लीं। सिर्फ इतना ही कह देना काफी होगा कि उन्होंने अटूट धन-संपत्ति प्राप्त कर ली, जिसने आगे चलकर उनके लिए एक बड़ी पूंजी का काम दिया और जिसके बल पर इंग्लैंड, स्टीम एंजिन चलाने में तथा 19वीं सदी में दुनिया में अपने औद्योगिक प्रभुत्व को स्थापित करने में सफल हो सका। 1774 में रेग्युलेटिंग एक्ट पास हुआ और कंपनी के कोर्ट ऑफ डाइरेक्टर्स (संचालक-सभा) के ऊपर बोर्ड ऑफ कण्ट्रोल (नियामक मण्डल) और कौन्सिल- सहित एक गवर्नर-जनरल की नियुक्ति हुई। तब गोया ब्रिटिश- पार्लमेण्ट ने पहले- पहल हिन्दुस्तानी इलाकों के शासन की कुछ जिम्मेवारी अपने ऊपर ली। धीरे- धीरे यह नियंत्रण बढ़ता गया और 1785 में एक दूसरा कानून पास हुआ। 1793, 1813, 1833 और 1853 में तहकीकात करने के बाद नए चार्टर दिए गए। 1833 में एक कानून बनाया गया कि ÷÷पूर्वोक्त प्रदेशों के कोई भी निवासी या बादशाह के कोई प्रजाजन, जो वहां रहते हों, महज अपने धर्म, जन्मस्थान, वंश या वर्ण के कारण कंपनी में किसी स्थान, पद या नौकरी से वंचित न रखे जाएंगे÷÷ और कोर्ट ऑफ डाइरेक्टर्स ने इसके महत्व को इस प्रकार समझायाः- ÷÷इस धारा का आशय कोर्ट यह मानती है कि ब्रिटिश भारत में कोई शासन करने वाली जाति न रहेगी। उनकी योग्यता की दूसरी कुछ भी कसौटियां रखी जाएं, जाति या धर्म का कोई भेद-भाव नहीं रखा जाएगा। बादशाह के प्रजाजन में से किसी को, फिर वे चाहे भारतीय, ब्रिटिश या मिश्र जाति के हों, उन्हें इन सनदी नौकरियों से वंचित नहीं रखा जाएगा और न ही वे सनदी नौकरियों से ही वंचित रखे जाएंगे, यदि दूसरी बातों में वे उनके योग्य हों।÷÷ उसी कानून के द्वारा कंपनी का भारत में व्यापार करने का अधिकार उड़ा दिया गया और इसके बाद से वह एक पूरी शासक-सत्ता के रूप में सामने आ गई। इसी समय भारत में अंग्रेजी शिक्षा का प्रवेश करने या न करने के विषय में एक चर्चा उठ खड़ी हुई। हिन्दुस्तानियों में राजा राममोहन राय और अंग्रेजों में मेकाले अंग्रेजी शिक्षा देने के जबरदस्त समर्थक थे। अंत में भारतीय भाषाओं और साहित्य के स्थान पर अंग्रेजी भाषा के पक्ष में निर्णय हुआ। उन दिनों अंग्रेजों के द्वारा चलाए अखबारों के सिवा कोई देशी अखबार न थे। इनमें भी बाज-बाज अखबार वालों को देश निकाला तक भुगतना पड़ा था। गवर्नर-जनरल लॉर्ड विलियम बेन्टिक का शासन-काल पूर्वोक्त सुधारों के कारण ही प्रसिद्ध हुआ था। उनकी नीति अखबारों के लिए भी नरम थी। उनके उत्तराधिकारी सर चार्ल्स मेट्कॉफ ने अखबारों पर से पाबन्दियां उठा लीं। फिर, लॉर्ड लिटन के वाइसराय होने तक अखबार इसी तरह आजादी में रहे - सिर्फ 1857 के गदर के जमाने को छोड़ कर। लॉर्ड डलहौजी की नीति व सैनिक विद्रोह 1833 और 53 के दर्म्यान पंजाब और सिंध जीत लिए गए और लॉर्ड डलहौजी की नीति ने कंपनी का इलाका बहुत बढ़ा दिया। लॉर्ड डलहौजी ने कई लावारिस राजाओं की रियासतें जब्त कर लीं तथा अवध की रियासत भी शासन ठीक न होने का सबब बताकर ब्रिटिश भारत में मिला ली। इसके सिवा आर्थिक शोषण भी जारी था, जिससे लोग दिन-दिन कंगाल होते गए। इधर रियासतें छिन गईं और उनकी जगह विदेशी हुकूमत कायम हो गई। यह बात लोगों को चुभ रही थी और वे मन-ही-मन कुढ़ रहे थे। नतीजा यह हुआ कि 1857 में उन्होंने विदेशी हुकूमत के जुए को फेंक देने का आखिरी सशस्त्र प्रयत्न किया। हां, इस बगावत में कुछ धार्मिक भाव भी जरूर था, परन्तु चूंकि एक ओर दिल्ली के नामधारी सम्राट, जो कि अकबर और औरंगजेब के वंशज थे, और दूसरी ओर पूना के पेशवाओं के वंशज, इन दोनों के झण्डे के नीचे जमा होकर लोग भारतीय राज्य स्थापित करना चाहते थे, इससे यह प्रतीत होता है कि यह गदर 1857 के पलासी-युद्ध के बाद सौ वर्षों तक भारत में जो कुछ घटनाएं घटती रहीं, उनके परिणाम का द्योतक था। यही नहीं, बल्कि वह प्रत्येक देश और जाति के मानव- हृदय की इस प्राकृतिक अभिलाषा को भी सूचित करता था कि हम अपने ही लोगों के द्वारा शासित हों, दूसरों के द्वारा हर्गिज नहीं। हालांकि गदर बेकार गया, परंतु उसके साथ ही ईस्ट इंडिया कंपनी भी तिरोहित हो गई और भारत सरकार का शासन- सूत्र सीधा ब्रिटिश ताज अर्थात् ब्रिटिश-पार्लमेण्ट के हाथों में आ गया। इस अवसर पर महारानी विक्टोरिया ने एक घोषणा प्रकाशित की, जिससे शान्ति और विश्वास का वातावरण पैदा हुआ। जो कुछ अशान्ति बच रही, अब उसका कोई सहारा बाकी नहीं रह गया था। राजा और खास करके नवाब बिल्कुल तहस- नहस हो चुके थे। कोई नामधारी व्यक्ति भी ऐसा नहीं रह गया था कि जिसके आसपास लोग जमा हो जाते और आगे 1857 की तरह कोई उत्पात खड़ा कर देते। अब लोग यह समझने लग गए कि भारत में अंग्रेजी राज्य ईश्वर की एक देन है और लोग उसी उदासीन और अलिप्त भाव से अपने कामकाज में लग गए। ब्रिटिश-पार्लमेण्ट के हाथ में शासन- सूत्र चले जाने के बाद भी भारत-सरकार की गतिविधि पहले की ही तरह जारी रही; हां, एक बात जरूर हुई कि उसका शासन 20 साल तक बिना किसी अशान्ति के जारी रहा। इस बीच कोई युद्ध वगैरा नहीं हुआ। परन्तु इसके यह मानी नहीं कि कोई रगड़ा-झगड़ा और कोई अशान्ति थी ही नहीं। ब्रिटिश-शासन में बड़ी बड़ी खराबियां थीं जिन्हें कि मि0 ह्यूम जैसे हमदर्द अंग्रेज अफसर दिखाया भी करते थे और कोशिश भी किया करते थे कि वे दूर हों। जैसा कि ऊपर कहा गया है, 1833 के कानून के अनुसार, भारतवासी उन तमाम जगहों पर लेने के काबिल करार दिए गए, जिनके लिए वे अधिकारी समझे जाते थे। 1853 में, जबकि चार्टर विचाराधीन था, पार्लमेण्ट में यह बात खुले आम कही जाती थी कि 1833 के कानून ने हालांकि भारतवासियों को नौकरियां देने का रास्ता खुला कर दिया है, फिर भी उनको अभी तक वे कोई जगह नहीं दी गई हैं जो कि इस कानून के पहले उन्हें नहीं दी जा सकती थीं। जबकि 1853 में सिविल सर्विस के लिए प्रतिस्पर्द्धी परीक्षाएं जारी की गईं तब इस बात की ओर ध्यान दिलाया गया था कि इससे हिन्दुस्तानियों के रास्ते में बड़ी रुकावटें पेश आएंगी; क्योंकि उनके लिए इंग्लैंड में आकर अंग्रेज लड़कों के साथ अंग्रेजी भाषा और साहित्य की परीक्षाओं में बाजी मार ले जाना असम्भव होगा। और यह भी उन नौकरियों के लिए जो आम तौर पर बहुत दुर्लभ थीं। परंतु इस बाधा के रहते हुए भी आखिर कुछ हिन्दुस्तानी समुद्र पार गए ही और उन्होंने सफलता भी प्राप्त की। इतने में ही तकदीर से लॉर्ड सेल्सबरी ने परीक्षा में बैठने की उम्र कम कर दी! इससे हिन्दुस्तानियों को लेने के देने पड़ गए। क्योंकि उधर वे अंग्रेजों की सहायता से हिन्दुस्तान और इंग्लैंड में साथ- साथ परीक्षा ली जाने की पुकार मचा रहे थे, इधर लॉर्ड लिटन ने देशी-भाषा के अखबारों का मुंह बंद कर दिया, जो कि मेटकॉफ के समय से लेकर अबतक अंग्रेजी अखबारों के साथ-साथ आजादी का सुख अनुभव कर रहे थे। उन्होंने एक शस्त्र कानून भी पास किया, जिसके अनुसार न केवल भारतवासियों के हथियार रखने के अधिकार को छीन लिया बल्कि हिन्दुस्तानियों और अंग्रेजों के बीच एक और जहरीला भेद-भाव पैदा कर दिया। फिर अकालों का भी दौर- दौरा होता रहा। अनाज की कमी उतनी नहीं थी जितने कि उसे खरीदने के साधर कम थे। इन अकालों से देश में हजारों लाखों आदमी काल के गाल हो गए। इसके अलावा अफगान-युद्ध हुआ, जिसमें बड़ा खर्च उठाना पड़ा। इधर तो एक ओर अकाल और मौत का दौर-दौरा हो रहा था, उधर दिल्ली में एक दरबार करने की तजबीज मुनासिब समझी गई, जिसमें महारानी विक्टोरिया ने भारत-सम्राज्ञी की उपाधि धारण की। ह्यूम साहब की दूरदृष्टि किसान भी पीड़ित थे। उनके कुछ कष्टों का वर्णन मि. ह्यूम ने सर ऑकलैंड कोलविन को लिखे अपने प्रसिद्ध पत्र में किया है। उनकी बड़ी शिकायतें ये थीं - (अ) दीवानी अदालतें असुविधाजनक और खर्चीली हैं। (आ) पुलिस घूसखोर है और बड़ी ज्यादतियां करती है। (इ) तरीका लगान सख्त है। (ई) शस्त्र और जंगल कानून का अमल चुभने वाला है। इसलिये लोगों ने प्रार्थनाएं कीं कि (क) न्याय सस्ता, निश्चित और जल्दी मिला करे, (ख) पुलिस ऐसी हो कि जिसे वे अपना दोस्त और रक्षक समझ सकें, (ग) तरीका लगान ज् +यादा लचीला हो और किसानों के साथ सहानुभूति रखकर बनाया गया हो, (घ) शस्त्र और जंगल के कानूनों का अमल कम सख्ती से किया जाये। परंतु ये मंजूर नहीं हुईं। सन 1880 की शुरुआत के लगभग दरअसल ऐसी हालत थी। यहां तक कि सर विलियम वेडरबर्न कहते हैं कि नौकरशाही ने न केवल नई सुविधाओं के रोकने में ही अपनी तरफ से कोर-कसर नहीं रखी, बल्कि जब-जब मौका मिला पिछले विशेषाधिकार भी छीन लिए गए; जैसे कि प्रेस की स्वाधीनता, सभायें करने का अधिकार, म्यूनिसिपल- स्वराज्य और विश्व- विद्यालयों की स्वतंत्रता। सर विलियम लिखते हैं - ÷÷एक तो ये अशुभ और प्रतिगामी कानून, दूसरे रूस के जैसे पुलिस का दमन। इससे लॉर्ड लिटन के समय में भारत में कोई क्रान्तिकारी विस्फोट होने ही वाला था कि मि. ह्यूम को ठीक मौके पर सूझी और उन्होंने इस काम में हाथ डाला।÷÷ इतना ही नहीं, बल्कि राजनीतिक अशान्ति अंदर-ही-अंदर बढ़ रही है, इसका अकाट्य प्रमाण मि. ह्यूम के पास था। उनके हाथ ऐसी रिपोर्टों की 7 जिन्दें लगीं, जिनमें भिन्न-भिन्न जिलों के अंदर बगावत के भाव फैलने का वर्णन था। भिन्न- भिन्न गुरुओं के कुछ शिष्यों का धर्माचार्यों और महन्तों से जो पत्र- व्यवहार हुआ, उसके आधार पर वे तैयार की गई थीं। यह हाल है लॉर्ड लिटन के शासन के अंत समय का, अर्थात् पिछली सदी के 70 से लेकर 80 साल के बीच का। ये रिपोर्टें जिला, तहसील, सब-डिवीजन के अनुसार तैयार की गई थीं और शहर, कस्बे और गांव भी उनमें शामिल थे। इसका यह अर्थ नहीं कि कोई सुसंगठित विद्रोह जल्दी होने वाला था, बल्कि यह कि लोगों में निराशा छाई हुई थी, वे कुछ-न-कुछ कर गुजरना चाहते थे, जिससे सिर्फ इतना ही अभिप्राय है कि संभव है ÷÷लोग जगह जगह हथियार लेकर टूट पड़ें और जिनसे वे नफरत करते थे उनकी खून-खराबी करने लगें, सेठ- साहूकारों के यहां चोरी और डाके डालने लगें और बाजारों में लूट मार करने लगे।÷÷ यों तो ये कार्य सिर्फ कानून की खिलाफवर्जी करने वाले हैं। परंतु यदि आवश्यक बल और संगठन का सहारा मिल जाए तो किसी भी दिन एक राष्ट्रीय बगावत के रूप में परिणत हो सकते हैं। बम्बई इलाके के दक्षिण प्रान्त में किसानों के ऐसे दंगे हो भी चुके थे। यह देखकर ह्यूम साहब ने इस अशान्ति को प्रकट करने का एक सरल उपाय ढूंढ निकाला, जो कि हमारी यह वर्तमान कांग्रेस है। इसी समय उनके दिमाग में यह खयाल आया कि हिन्दुस्तानियों की एक राष्ट्रीय सभा कायम की जाए और उन्होंने 1 मार्च, 1883 ईस्वी को कलकत्ता विश्वविद्यालय के ग्रेजुएटों के नाम एक पत्र लिखा, जो कि दिल को हिला देने वाला था। उसमें उन्होंने 50 ऐसे आदमियों की मांग की थी जो, भले, सच्चे, निःस्वार्थ, आत्मसंयमी, नैतिक साहस रखने वाले और दूसरों का हित करने की तीव्र भावना रखने वाले हों। ÷÷यदि सिर्फ 50 भले और सच्चे आदमी संस्थापक के रूप में मिल जाएं तो सभा स्थापित हो सकती है और आगे का काम आसान हो सकता है।÷÷ और इन लोगों के सामने आदर्श क्या पेश किया गया? यह कि-÷÷सभा का विधान प्रजासत्तात्मक हो, सभा के लोग व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा से परे हों, और उनका यह सिद्धान्त-वचन हो, कि जो तुममें सबसे बड़ा है उसी को तुम्हारा सेवक होने दो।÷÷ पत्र में उन्होंने गोलमोल बातें नहीं कीं; बल्कि साफ शब्दों में कह दिया, कि ÷÷यदि आप अपना सुख चैन नहीं छोड़ सकते तो कम से कम फिलहाल हमारी प्रगति की सारी आशा व्यर्थ है, और यह कहना होगा कि हिन्दुस्तान सचमुच मौजुदा सरकार से बेहतर शासन न तो चाहता है और न उसके योग्य ही है। इस स्मरणीय पत्र का अंतिम भाग इस प्रकार है :- ÷÷और यदि देश के विचारशील नेता भी या तो सब-के-सब ऐसे निर्बल जीव हैं, या अपनी स्वार्थ-साधना में ही इतने निमग्न हैं कि अपने देश के लिए कोई साहसपूर्ण कार्य नहीं कर सकते, तब कहना होगा कि वे सही और वाजिब तौर पर ही दबाकर रखे और पद-दलित किए गए हैं; क्योंकि इससे ज्यादा अच्छे व्यवहार के योग्य ही नहीं थे। प्रत्येक राष्ट्र ठीक-ठीक वैसी ही सरकार प्राप्त कर लेता है जिसके कि योग्य वह होता है। यदि आप, जो देश के चुनीदा लोग हैं, जो बहुत ही शिक्षा प्राप्त हैं, अपने सुख-चैन और स्वार्थ पूर्ण उद्देश्यों को नहीं छोड़ सकते और अधिकाधिक स्वाधीनता प्राप्त करने के लिए लड़ने का निश्चय नहीं कर सकते, जिससे कि आपके देशवासियों को अधिक निष्पक्ष शासन का लाभ हो, वे अपने घ का प्रबंध करने में अधिकाधिक हिस्सा लें, तब मानना होगा कि हम, जोकि आपके मित्र हैं, गलती पर हैं, और जो हमारे विरोधी हैं उनका कहना ही सही है; तब मानना होगा कि लॉर्ड रिपन की आपके हित के संबंध में जो उच्च आकांक्षाएं हैं, वे निष्फल होंगी और वे हवाई ठहरेंगी; तब कहना होगा कि प्रगति की तमाम आशाएं अब नष्ट समझनी चाहिएं और हिन्दुस्तान सचमुच उसकी मौजूदा सरकार से बेहतर शासन प्राप्त करना न तो चाहता है और न ही उसके योग्य है। और यदि यही बात सच है तो फिर न तो आपको इस बात पर मुंह ही बनाना चाहिए, न शिकायत ही करनी चाहिए, कि हम जंजीरों में जकड़ दिए गए हैं और हमारे साथ बच्चे-का सा व्यवहार किया जाता हे; और न आपको इसके विरोध में कोई दल खड़ा करना चाहिए; क्योंकि आप अपने को इसी लायक साबित करेंगे। जो मनुष्य होते हैं वे जानते हैं कि काम कैसे करना चाहिए, इसलिए अब से आप इस बात की शिकायत न कीजिएगा कि बड़े-बड़े ओहदों पर आपकी बनिस्बत अंग्रेजों को क्यों तरजीह दी जाती है; क्योंकि आपमें वह सार्वजनिक सेवा का भाव नहीं है, वह उच्च प्रकार की परोपकार- भावना नहीं है, जो सार्वजनिक हित के सामने व्यक्तिगत ऐशो-आराम को छोटा बना देती है; वह देशभक्ति का भाव नहीं है जिसने कि अंग्रेजों को वैसा बना दिया है जैसे कि वे आज हैं। और मैं कहूंगा कि वे ठीक ही आपकी जगह तरजीह पाते हैं और उनका लाजिमी तौर पर आपका शासन बन जाना भी ठीक है; बल्कि वे आगे भी आपके अफसर बने रहेंगे, और आपके कंधों पर रखा यह जुआ तब तक दुखदायी न होगा, जब तक कि आप इस चिर-सत्य को अनुभव नहीं कर लेते और इसके अनुसार चलने की तैयारी नहीं कर लेते कि आत्म-बलिदान और निःस्वार्थता ही सुख और स्वातंत्रय के अचूक पथ-प्रदर्शक हैं।÷÷ पहले के महान व्यक्ति और संस्थाएं कांग्रेस के जन्म से संबंध वाली तफसीली बातों का बयान करने के पहले, यदि हम कांग्रेस-काल के पहले के उन बड़े-बूढ़े लोगों का नाम-स्मरण कर लें तो अनुचित नहीं होगा, जिनके क्रिया-कलाप ने एक तरह से इस देश में सार्वजनिक जीवन की बुनियाद डाली है। सबसे पहले बंगाल के ब्रिटिश इण्डियन एसोसिएशन का नाम आता है। 1851 में उसकी स्थापना की गई थी और यह वह संस्था है जिसके नाम की छाया में डॉ0 राजेनद्रलाल मित्र और रामगोपाल घोष जैसे व्यक्ति बीसों साल तक काम करते रहे। यह एसोसिएशन खुद भी कोई पचास साल तक देश में एक सजीव शक्ति बना रहा। बम्बई में सार्वजनिक कार्य की संस्था थी बाम्बे एसोसियेशन। बंगाल के एसोसिएशन के मुकाबले में वह थोड़े समय रहा, परन्तु कार्य उसने भी उसी तरह जोर- शेर से किया। उसके नेता थे - सर मंगलदास नाथूभाई और श्री नौरोजी फरूंदजी। स्वर्गीय दादाभाई नौरोजी और जगन्नाथ शंकर सेठ ने उसकी स्थापना की थी; परंतु बाद में पिछली शताब्दी के अंतिम चरण में ईस्ट- इण्डिया एसोसिएशन ने उनका स्थान ग्रहण कर लिया था। मद्रास में सार्वजनिक सेवा की वास्तविक शुरुआत ÷हिन्दू÷ के द्वारा हुई, जिसके कि संस्थापकों में एम. वीर राघवाचार्य, माननीय रंगैया नायडू, जी. सुब्रह्यण्य ऐयर और एन. सुब्बाराव पन्तुलु जैसे गण्य- मान्य पुरुष थे। महाराष्ट्र में पूना की सार्वजनिक सभा का जन्म प्रायः उसी समय हुआ जब कि ÷हिन्दु÷ का हुआ था और उसके द्वारा रावबहादुर नुलकर और श्री चिपलूणकर जैसे प्रसिद्ध सार्वजनिक कार्य करते रहे। बंगाल में, 1873 में, इण्डियन एसोसियशन की स्थापना हुई, जिसके जीवनप्राण सुरेन्द्रनाथ बनर्जी थे ओर जिसके पहले मंत्री थे आनंदमोहन वसु। यह ध्यान में रखना होगा कि इस कांग्रेस- पूर्व-काल में भी यद्यपि सार्वजनिक जीवन सुसंगठित नहीं हो पाया था तथापि उसका असर अधिकारियों पर होने लगा था। हां, अखबार उस जीवन का एक हिस्सा था। 1857 में कोई 475 अखबार थे, जिनमें से अधिकांश प्रान्तीय भाषाओं में निकलते थे। इन्हीं दिनों देश के सुदैव से सुरेन्द्रनाथ बनर्जी सिविल सर्विस से मुक्त हो चुके थे। उन्होंने उत्तरी भारत के पंजाब और युक्त- प्रान्त में राजनीतिक यात्रा की। वह 1877 के प्रसिद्ध दिल्ली दरबार में देश के राजा-महाराजाओं और गण-मान्य लोगों को एक जगह एकत्र देखकर ही पहले-पहल सुरेन्द्रनाथ बनर्जी के मन में यह प्रेरणा उठी कि एक देश-व्यापी राजनीतिक संगठन बनाया जाए। 1878 में सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने बम्बई और मद्रास प्रान्त की यात्रा की, जिसका उद्देश्य यह था कि लॉर्ड सेल्सबरी ने सिविल सर्विस की परीक्षा की उम्र घटाकर जो 19 साल की कर दी थी, उसके खिलाु लोकमत जाग्रत किया जाए और इस विषय पर कामन-सभा में पेश करने के लिए सारे देश की तरफ से एक मेमोरियल तैयार किया जाए। लॉर्ड रिपन की सहानुभूति इसी समय लॉर्ड लिटन के प्रतिगामी शासन की शुरुआत होती है। उनके जमाने में (1878) वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट बना, अफगान- युद्ध हुआ, बड़ा खर्चीला दरबार किया गया और 1877 में ही कपास-आयात कर उठा दिया गया। लॉर्ड लिटन के बाद लॉर्ड रिपन का दौर हुआ, जिन्होंने अफगानिस्तान के अमीर के साथ सुलह करके, वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट को रद्द करके, स्थानीक स्वराज्य का आरंभ करके और इलबर्ट बिल को उपस्थित करके एक नए युग का श्रीगणेश किया। यह आखिरी बिल भारत सरकार के ततकालीन लॉ मेम्बर मि0 इलबर्ट ने 1883 में उपस्थित किया था, जिसका उद्देश्य यह था कि हिन्दुस्तानी मजिस्ट्रेटों पर से ये रुकावट उठा ली जाए जिसके द्वारा वे यूरोपियन और अमेरिकन अपराधियों के मुकदमे फैसला नहीं कर सकते थे। इस पर गोरे लोग इतने बिगड़े कि कुछ लोगों ने तो गवर्नमेन्ट हाउस के मंत्रियों को मिलाकर वाइसराय को जहाज पर बिठाकर इंग्लैंड भेजने की एक साजिश ही कर डाली। इस साजिश में कलकत्ते के कई लोगों का हाथ था, जिन्होंने यह संकल्प कर लिया था कि यदि सरकार ने इस बिल को आगे बढ़ाया, तो वे इस साजिश को कामयाब बना कर छोड़ेंगे। नतीजा यह हुआ कि असली बिल उसी साल करीब- करीब हटा लिया गया और उसकी जगह यह सिद्धान्त-भर मान लिया गया कि सिर्फ जिला-मजिस्ट्रेट और दौरा-जज को ही ऐसा अधिकार रहेगा। जब लार्ड रिपन भारत से बिदा हुए तो देश के एक छोर से लेकर दूसरे छोर तक के लोगों ने उन्हें हार्दिक बिदाई दी। अंग्रेजों के लिए वह एक ईर्ष्या का विषय हो गई थी, किन्तु उससे बहुतेरे लोगों की आंखें भी खुल गई थीं। राजनीतिक संस्थाएं इस बिल के संबंध में गोरे लोगों को जो सफलता मिल गई, उससे हिन्दुस्तानी जाग उठे और उन्होंने बहुत जल्दी इस बिल के विरोध का आन्तरिक हेतु पहचान लिया। गोरे यह मनवाना चाहते थे कि हिन्दुस्तान पर गोरी जातियों का प्रभुत्व है और वह सदा रहेगा। इसने भारत के तत्कालीन देश सेवकों को संगठन के महत्व का पाठ पढ़ाया और उन्होंने तुरंत ही 1883 में कलकत्ता के अलबर्ट-हॉल में एक राजनीतिक परिषद् की आयोजना की, जिसमें सुरेन्द्रनाथ बनर्जी और आनंदमोहन वसु दोनों उपस्थित थे। इस सभा में सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने अपने आरम्भिक भाषण में खास तौर पर इस बात का जिक्र किया कि किस तरह दिल्ली दरबार ने उनके सामने एक राजनीतिक संस्था, जो कि भारत के हित- साधन में तत्पर रहे, बनाने का नमूना पेश किया था। इस विषय में बाबू अम्बिकाचरण मुजुमदार ने अपनी ÷दी इण्डियन नेशनल इवाल्युशन÷ नामक पुस्तक में इस तरह लिखा है - ÷÷परिषद् का दृश्य अद्वितीय था। मेरी आंखों के सामने उस समय के तीनों दिन के उत्साह और लगन का हूबहू चित्र आज भी खड़ा है। जब परिषद् खत्म होने लगी तो मानों हरेक आदमी को, जो उसमें मौजूद था, एक नई रोशनी और एक अद्भुत स्फूर्ति प्राप्त हो रही थी।÷÷ इसके दूसरे ही वर्ष कलकत्ते में अन्तर्राष्ट्रीय परिषद् हुई और मद्रास में प्रान्तीय परिषद् का अधिवेशन हुआ। पश्चिम भारत में 31 जनवरी, 1885 को महता, तैलंग और तैयबजी की मशहूर मंडली ने मिलकर बाम्बे प्रेसीडेन्सी एसोसिएशन कायम किया। पूर्वोक्त वर्णन से यह स्पष्ट मालूम होता है कि भारतवर्ष मन-ही-मन किसी अखिल भारतीय संगठन की आवश्यकता का अनुभव करता था। यह तो अभी तक एक रहस्य ही है कि अखिल भारतीय कांग्रेस की कल्पना वास्तव में किसके मस्तिष्क से निकली। 1877 के दरबार या कलकत्ते की अन्तर्राष्ट्रीय प्रदर्शनी के अलावा थियोसोफिकल कन्वेन्शन का भी नाम इस विषय में लिया जाता है, जो कि दिसम्बर 1884 में मद्रास में हुआ था। वहां 17 आदमियों की एक निजी सभा हुई, जिसमें यह कल्पना सोची गई। मि0 एलेन ऑक्टेवियन ह्यूम ने सिविल सर्विस से अवसर प्राप्त करने के बाद जो इण्डियन यूनियन कायम की थी वह भी कांग्रेस के जन्त का एक निमित्त बतलाई जाती है। खैर, कोई भी इस कल्पना का मूल उत्पादक हो और कहीं से यह पैदा हुई हो, हम इन नतीजों पर जरूर पहुंचते हैं कि यह कल्पना वातावरण में घूम अवश्य रही थी और ऐसे संगठन की आवश्यकता महसूस की जा रही थी। मि0 ए.ओ. ह्यूम ने इसमें सबसे पहले कदम बढ़ाया और 23 मार्च 1885 में इसके संबंध में पहला नोटिस जारी किया गया, जिसमें बताया गया था कि अगले दिसम्बर में, पूना में इण्डियन नेशनल यूनियन का पहला अधिवेशन किया जाएगा। इस तरह अब तक जो एक अस्पष्ट कल्पना वातावरण में पंख फटफटा रही थी और जो उत्तर- दक्षिण, पूर्व- पश्चिम, सभी जगह के विचारशील भारतवासियों के विचारों को गति दे रही थी उसने अब एक निश्चित स्वरूप ग्रहण कर लिया और एक व्यावहारिक कार्यक्रम के रूप में देश के सामने आ गई। जो भरा नहीं है भावों से, बहती जिसमें रसधार नहीं। वह हृदय नहीं है, पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं। रामनरेश त्रिपाठी कांग्रेस का पहला अधिवेशन कांग्रेस की स्थापना का उद्देश्य आरंभ में शासक एवं शासित को परस्पर करीब लाने का था। मि. ह्यूम का खयाल शुरू-शुरू में यह था कि कलकत्ते के इण्डियन एसोसिएशन, बम्बई के प्रेसिडेन्सी एसोसियेशन और मद्रास के महाजन-सभा जैसी प्रान्तीय संस्थायें राजनीतिक प्रश्नों को हाथ में लें और आल इण्डिया नेशनल यूनियन बहुत-कुछ सामाजिक प्रश्नों में ही हाथ डाले। उन्होंने लॉर्ड डफरिन से इस विषय में सलाह ली, जो कि हाल ही में वाइसराय बन कर आए थे। उन्होंने जो सलाह दी वह उमेशचंद्र बनर्जी के शब्दों में इस प्रकार हैः- ÷÷बहुतों को यह एक नई बात मालूम होगी कि कांग्रेस का जन्म किस तरह हुआ और जिस तरह वह तब से अब तक चलाई जा रही है, वह वास्तव में लॉर्ड डफरिन का काम था, जब कि वह भारत के वाइसराय कि यदि भारत के प्रधान- प्रधान राजनीतिज्ञ पुरुष साल में एक बार एकत्र होकर सामाजिक विषयों पर चर्चा कर लिया करें और एक दूसरे से मित्रता का संबंध स्थापित कर लें तो इससे बड़ा लाभ होगा। वह यह नहीं चाहते थे कि यदि देश के भिन्न-भिन्न भागों के राजनीतिज्ञ जमा होकर राजनीतिक विषयों पर चर्चा करने लगेंगे तो इससे उन प्रान्तीय संस्थाओं का महत्व कम हो जाएगा। वह यह भी चाहते थे कि जिस प्रान्त में यह सभा हो वहां का गवर्नर उसका सभापति हो, जिससे कि सरकारी और गैरसरकारी राजनीतिज्ञों में अच्छे संबंध स्थापित हों। इन खयालों को लेकर वह 1885 में लॉर्ड डफरिन से शिमला में मिले। लॉर्ड डफरिन ने उनकी बातों को ध्यान से और दिलचस्पी से सुना और कुछ समय के बाद मि. ह्यूम से कहा कि मेरी समझ में यह तजवीज, कि गवर्नर सभापति बने, उपयोगी न होगीः क्योंकि इस देश में ऐसा कोई सार्वजनिक मण्डल नहीं है कि इंग्लैंड की तरह यहां सरकार के विरोध का काम करे - हालांकि यहां अखबार हैं और वे लोकमत को प्रदर्शित करते हैं, फिर भी उन पर आधार नहीं रखा जा सकता; और अंग्रेज जो हैं, वे जानते ही नहीं कि लोग उनके और उनकी नीति के बारे में क्या खयाल करते हैं। इसलिए ऐसी दशा में यह अच्छा होगा और इसमें शासक और शासित दोनों का हित है, कि यहां के राजनीतिज्ञ प्रति वर्ष अपना सम्मेलन किया करें और सरकार को बताया करें कि शासन में क्या- क्या त्रुटियां हैं और उसमें क्या-क्या सुधार किये जाएं। उन्होंने यह भी कहा कि ऐसे सम्मेलन का सभापति स्थानीय गवर्नर न होना चाहिए, क्योंकि उसके सामने संभव है, लोग अपने सही खयालात जाहिर न करें। मि. ह्यूम को लॉर्ड डफरिन की दलील जंची और जब उन्होंने कलकत्ता, बम्बई, मद्रास और दूसरी जगहों के राजनीतिज्ञों के सामने उसे रखा तब उन्होंने भी लॉर्ड डफरिन की सलाह को एक स्वर में पसन्द कर लिया तथा उसके मुताबिक कार्रवाई भी शुरू कर दी। लॉर्ड डफरिन ने मि. ह्यूम से यह शर्त करा ली थी कि जब तक मैं इस देश में हूं तब तक इस सलाह के बारे में मेरा नाम कहीं न लिया जाए। मि. ह्यूम ने इसका पूरी तरह पालन भी किया।÷÷ मार्च, 1885 में यह तय हुआ कि बड़े दिनों की छुट्टियों में देश के सब भागों के प्रतिनिधियों की एक सभा की जाए। पूना इसके लिए सबसे उपयुक्त जगह समझी गई। इस बैठक के लिए एक गश्ती पत्र जारी किया गया, जिसका मुख्य अंश नीचे दिया जाता हैः- ÷÷25 से 31 दिसंबर 1885 तक पूना में इण्डियन नेशनल यूनियन की एक परिषद् की जाएगी। इसमें बंगाल, बंबई और मद्रास प्रदेशों के प्रतिनिधि, अर्थात् राजनीतिज्ञ, सम्मिलित होंगे। ÷÷इस परिषद् के प्रत्यक्ष उद्देश्य यह होंगे - (1) राष्ट्र की प्रगति के कार्य में जी-जान से लगे हुए लोगों का एक-दूसरे से परिचय हो जाना। (2) इस वर्ष में कौन-कौन से राजनैतिक कार्य अंगीकार किए जाएं इसकी चर्चा करके निर्णय करना। ÷÷अप्रत्यक्ष-रूप से यह परिषद् एक देशी पार्लिमेण्ट का बीच- रूप बनेगी और यदि इसका कार्य सुचारू-रूप से चलता रहा तो थोड़े ही दिनों में इस आक्षेप का मुंहतोड़ जवाब होगी कि हिन्दुस्तान प्रातिनिधिक शासन- संस्थाओं के बिलकुल अयोग्य है। पहली परिषद में यह तय होगा कि दूसरी परिषद पूना में ही की जाए या ब्रिटिश एसोसियेशन की तरह हर साल देश के प्रधान-प्रधान भागों में की जाए। यह अंदाज है कि पूना के मित्रों के अलावा बंबई, मद्रास और बंगाल से कोई बीस-बीस प्रतिनिधि आएंगे, और इनसे आधे युक्तप्रान्त और पंजाब से।÷÷ इस तरह अपने को वाइसराय के आशीर्वाद से सुरक्षित करके ह्यूम साहब इंग्लैंड पहुंचे और वहां लार्ड रिपन, लॉर्ड डलहौजी, सर जेम्स केअर्ड, जॉन ब्राइट, मि0 रीड, मि0 स्लेग और दूसरे प्रसिद्ध पुरुषों से मशविरा किया। उनकी सलाह से उन्होंने वहां एक संगठन किया। जो आगे चलकर इंग्लैंड के इण्डियन पार्लिमेण्टरी कमेटी के रूप में परिणत हो गया और जिसका उद्देश्य था पार्लिमेण्ट के उम्मीदवरों से यह प्रतिज्ञा करवाना कि वे हिन्दुस्तान के मामलों में दिलचस्पी लेंगे। उन्होंने वहां एक इण्डियन टेलीग्राफ़ यूनियन बनाई, जिसका उद्देश्य था इंग्लैंड के प्रधान- प्रधान प्रान्तीय पत्रों को महत्वपूर्ण विषयों पर तार भेजने के लिए धन-संग्रह करना। अधिवेशन पूना में हुआ इस पहले अधिवेशन का बड़ा रोचक वर्णन अपनी ÷हाऊ इण्डिया रॉट फॉर फ्रीडम÷ नामक पुस्तक में श्रीमती बेसेण्ट ने किया है, जिससे नीचे लिखा अंश यहां उद्धृत किया जाता हैः- ÷÷लेकिन पहला अधिवेशन पूना में नहीं हुआ; क्योंकि बड़े दिन के पहले ही वहां हैजा शुरू हो गया और यह ठीक समझा गया कि परिषद, जिसे अब कांग्रेस कहते हैं, बम्बई में की जाए। गोकुलदास तेजपाल संस्कृत कालेज और छात्रालय के व्यवस्थापकों ने अपने विशाल भवन कांग्रेस के हवाले कर दिए और 27 दिसंबर की सुबह तक भारतीय राष्ट्र के प्रतिनिधियों के स्वागत करने की पूरी तैयारी हो गई। जो व्यक्ति उस समय वहां उपस्थित थे, उनकी नामावली पर एक निगाह डालते हैं तो उनमें से कितने ही आगे चल कर भारत की स्वाधीनता का प्रयत्न करते हुए बहुत प्रसिद्ध हो गए थे। जो सज्जन प्रतिनिधि नहीं बन सकते थे उनमें थे सुधारक दीवान-बहादुर आर. रघुनाथराव, डिप्टी कलेक्टर, मद्रास; माननीय महादेव गोविन्द रानाडे, कौंसिल के सदस्य और जज स्माल कॉज कोर्ट पूना, जो आगे चल कर बम्बई हाईकोर्ट के जज हो गये और जो एक माननीय और विश्वसनीय नेता थे; लाला बैजनाथ, आगरा, जो बाद को एक प्रख्यात विद्वान और लेखक प्रसिद्ध हुए; और अध्यापक के सुंदर रमण और रामकृष्ण गोपाल भांडाकर। प्रतिनिधियों में नामीनामी पत्रों के सम्पादक थे; जैसे-÷ज्ञान-प्रकाश÷ जो कि पूना सार्वजनिक-सभा का त्रैमासिक पत्र था, ÷मराठा-केसरी÷, ÷नव-विभाकर÷, ÷इण्डियन- मिरर÷, ÷नसीम÷, ÷हिन्दुस्तानी÷, ÷ट्रिब्यून÷, ÷इण्डियन- यूनियन÷, ÷स्पेक्टेटर÷, ÷इंदु प्रकाश÷, ÷क्रेसेंट÷,। इनके अलावा नीचे लिखे माननीय और परिचित सज्जनों के नाम भी चमक रहे थे - ह्यूम साहब, शिमला; उमेशचंद्र बनर्जी और नरेन्द्रनाथ सेन, कलकत्ता; वामन सदाशिव आपटे और गोपाल गणेश आगकर, पूना; गंगाप्रसाद वर्मा, लखनऊ; दादाभाई नौरोजी, काशीनाथ, त्र्यम्बक तैलंग, फीरोजशाह मेहता, बम्बई कारपोरेशन के नेता, दीनशा एदलजी वाचा, बहराम जी मालावारी, नारायण गणेश चंदावरकर, बंबई; पी. रगैया नायडू, प्रेसिडेण्ट महाजनसभा, एस. सुब्रह्यण्य ऐयर, पी. आनंदा चार्लू, जी. सुब्रह्मण्य ऐयर, एम. वीर राधवाचार्य, मद्रास; पी. केशव पिल्ले, अनंतपुर। इनमें वे लोग भी थे जो भारत की आजादी के लिए खप चुके, और वे भी थे जो अब भी कायम हैं और उसके लिए यत्नशील हैं। ÷÷28 दिसम्बर 1885 को दिन के 12 बजे गोकुलदास तेजपाल संस्कृत कालेज के भवन में कांग्रेस का पहला अधिवेशन हुआ। पहली आवाज सुनाई पड़ी ह्यूम साहब की, माननीय एस0 सुब्रह्यमण्य ऐअर की और माननीय काशीनाथ त्र्यबंक तैलंग की। ह्यूम साहब ने श्री उमेश बनर्जी के सभापतित्व का प्रस्ताव उपस्थित क्षण था, जिसमें मातृभूमि के द्वारा सम्मानिक अनेकों व्यक्तियों में प्रथम पुरुष ने प्रथम राष्ट्रीय महासभा के अध्यक्ष का स्थान ग्रहण किया। ÷÷कांग्रेस की गुरुता की ओर प्रतिनिधियों का ध्यान दिलाते हुए अध्यक्ष महोदय ने कांग्रेस का उद्देश्य इस तरह बतलाया :- (क) साम्राज्य के भिन्न-भिन्न भागों में देश-हित के लिए लगन से काम करने वालों की आपस में घनिष्ठता और मित्रता बढ़ाना। (ख) समस्त देश- प्रमियों के अंदर प्रत्यक्ष मैत्री- व्यवहार के द्वारा वंश, धर्म और प्रान्त संबंधी तमाम पूर्वदूषित संस्कारों को मिटाना और राष्ट्रीय ऐक्य की उन तमाम भावनाओं का, जो लॉर्ड रिपन के चिर-स्मरणीय शासनकाल में उद्भूत हुईं, पोषण और परिवर्तन करना। (ग) महत्वपूर्ण और आवश्यक सामाजिक प्रश्नों पर भारत के शिक्षित लोगों में अच्छी तरह चर्चा होने के बाद जो परिपक्व सम्मतियां प्राप्त हों उनका प्रामाणिक संग्रह करना। (घ) उन तरीकों और दिशाओं का निर्णय करना जिनके द्वारा भारत के राजनीतिज्ञ देश-हित के कार्य करें।÷÷ इस प्रथम अधिवेशन में नौ प्रस्ताव स्वीकृत हुए; जिनके द्वारा भारत की मांगों के बनने की शुरुआत होती है। पहले प्रस्ताव के द्वारा भारत के शासन- कार्य की जांच के लिए एक रॉयल कमीशन बैठाने की मांग की गई। दूसरे के द्वारा इण्डिया कौंसिल को तोड़ देने की राय दी गई। तीसरे प्रस्ताव के द्वारा धारा-सभा की त्रुटियां दिखाई गईं, जिनमें अब तक नामजद सदस्य थे और उनके बजाय चुने हुए रखने की, प्रश्न पूछने का अधिकार देने की, युक्तप्रान्त और पंजाब में कौंसिल कायम की जाने की ओर कामन-सभा में स्थायी समिति कायम करने की मांग की गई-इस आशय से कि कौंसिलों में बहुमत से जो विरोध हो उन पर उसमें विचार किया जाये। चौथे के द्वारा यह प्रार्थना की गई कि आई.सी.एस. की परीक्षा इंग्लैण्ड और भारत में एक साथ हो और परीक्षार्थियों की उम्र बढ़ा दी जाय। पांचवा और छठा फ़ौजी खर्च से संबंध रखता था और सातवें में अपर बर्मा को मिला लेने तथा भारत में इसे सम्मिलित कर लेने की तजवीज का विरोध किया गया था। आठवें के द्वारा यह प्रार्थना की गयी कि ये प्रस्ताव राजनीतिक सभाओं को भेज दिये जाएं। तदनुसार सारे देश में तमाम राजनैतिक मण्डलों और सार्वजनिक सभाओं द्वारा उन पर चर्चा की गई और कुछ मामूली संशोधनों के बाद वे बड़े उत्साह से पास किये गये। अंतिम प्रस्ताव में अगले अधिवेशन का स्थान कलकत्ता और ता0 28 दिसंबर नियत हुई। कांगे्रस का दावा जिस प्रकार एक बड़ी नदी का मूल एक छोटे से सोते में होता है उसी प्रकार महान् संस्थाओं का आरंभ भी बहुत मामूली होता है। जीवन की शुरूआत में वे बड़ी तेजी के साथ दौड़ती है, परन्तु ज्यों-ज्यों वे व्यापक होती जाती हैं त्यों-त्यों उनकी गति मन्द किन्तु स्थिर होती जाती है। ज्यों- ज्यों वे आगे बढ़ती हैं, त्यों-त्यों उनमें सहायक नदियां मिल जाती हैं और वे उसको अधिकाधिक सम्पन्न बनाती जाती हैं। यही उदाहरण हमारी कांगे्रस के विकास पर भी लागू होताहै। उसे अपना रास्ता बड़ी- बड़ी बाधाओं में से तय करना था, इसलिए आरंभ में उसने अपने सामने छोटे-छोटे आदर्श रखें, परन्तु ज्योंही उसे समस्त भारतवासियों के हार्दिक प्रेम का सहारा मिला, उसने अपना मार्ग विस्तृत कर दिया और अपने उदय में देश की अनेक सामाजिक नैतिक हलचलों का भी समावेश कर लिया। आरम्भिक अवस्थाओं में उसके कार्यों में एक किस्म की हिचकिचाहट और शंका-कुशंकायें दिखाई देती थी; परन्तु जैसे जैसे वह बालिग होती गई तैसे-तैसे उसे अपने बल और क्षमता का ज्ञान होता गया और उसकी दृष्टि व्यापक बनती गई। अनुनय विनय की नीति को छोड़कर उसने आत्मतेज और आत्मावलम्बन की नीति ग्रहण की। इधर लोक मत को शिक्षित करने के लिए जोर शोर से प्रचार कार्य होने लगे, जिससे देशव्यापी संगठन बन गया। यहां तक कि सीधे हमले तक का कार्यक्रम बनाना पड़ा। शिकायतों और अपने दुःख दर्दों को दूर कराने के उद्देश्य से शुरूआत करके कांगे्रस देश की एक ऐसी मान्य संस्था के रूप में परिणत हो गई जो बड़े स्वाभिमान के साथ अपनी मांगें भी पेश करने लगी। हालांकि शुरूआत के दस पांच वर्षों में शासन संबंधी मामलों में उसकी दृष्टि की एक सीमा बनी हुई थी, फिर भी शीघ्र ही वह भारतवासियों की तमाम राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की एक जबरदस्त और सत्तापूर्ण प्रतिपादक बन गई। उसका दरवाजा सब दर्जे और सब जातियों के लोगों के लिए खोल दिया गया। यद्यपि शुरूआत में वह उन प्रश्नों को हाथ में लेती हुई संकोच करती थी जो सामाजिक कहे जाते थे, परन्तु उचित समय आते ही उसने इस बात को मानने से इंकार कर दिया कि जीवन अलग-अलग टुकड़ों में बंटा हुआ है। और इस प्राचीन परम्परागत विचार के आगे जाकर, जो जीवन के प्रश्नों को सामाजिक और राजनीतिक सीमाओं में बांध देता है, उसने एक ऐसा सर्वव्यापी आदर्श अपने सामने प्रस्तुत किया, जिसमें कि सारा जीवन, यहां से वहां तक, एक और अविभाज्य है। इस तरह कांग्रेस एक ऐसा राजनीतिक संगठन है, जहां न ब्रिटिश भारत और देशी राज्यों का भेद है, न एक प्रान्त और दूसरे प्रान्त का। उसमें न उच्च वर्ग या जनता भेद है, न शहर और गांव का, और न गरीब अमीर का भेद है न किसान मजदूर का जात-पांत और मजहबों का भेदभाव भी उसमें नहीं हे। गांधी जी ने दूसरी गोलमेज परिषद् के समय फेडरल स्ट्रकचर कमेटी केसामने जो जबरदस्त वक्तृता दी थी और जिमसें उन्होंने कांगे्रस के बारे में ही दावा किया था, उसके आवश्यक अंश नीचे दे देना उचित होगा। ''यदि मैं गलती नहीं करता हूं, तो कांग्रेस भारतवर्ष की सबसे बड़ी संस्था है। इसकी अवस्था लगभग 50 वर्ष की है, और इस अर्से में वह बिना किसी रुकावट के बराबर अपने वार्षिक अधिवेशन करती रही है। सच्चे अर्थों में वह राष्ट्रीय है। वह किसी खास जाति, वर्ग या किसी विशेष हित की प्रतिनिधि नहीं है। वह सर्व भारतीय हितों और सब वर्गों की प्रतिनिधि होने का दावा करती है। मेरे लिए यह बताना सबसे बड़ी खुशी की बात है कि उसकी उपज आरम्भ में एक अंगे्रज मस्तिष्क में हुई। ऐलन ओक्टेवियन ह्यूम को कांगे्रस के पिता के रूप में हम जानते हैं। दो महान पारसियों - फिरोज शाह मेहता और दादाभाई नैरोजी ने जिन्हें सारा भारत ÷वृद्ध पितामह कहने में प्रसन्नता अनुभव करता है, इसका पोषण किया। आरम्भ से ही कांगे्रस में मुसलमान, ईसाई, गोरे आदि शामिल थे, बल्कि मुझे यों कहना चाहिए कि इसमें सब धर्म, सम्प्रदाय और हितों का थोड़ी बहुत पूर्णता के साथ प्रतिनिधित्व होता था। मुसलमान और पारसी भी कांगे्रस के सभापति रहे। मे। इस समय कम से कम एक भारतीय ईसाई श्री उमेशचन्द बनर्जी का नाम भी ले सकता हूं। विशुद्ध भारतीय श्री कालीचरण बनर्जी ने, जिनके परिचय का मुझे सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ, अपने को कांगे्रस के साथ एक कर दिया था। मै, और निस्सन्देह आप भी, अपने बीच श्री के.टी. पाल का अभाव अनुभव कर रहे होंगे। यद्यपि मैं ठीक नहीं जानता, लेकिन जहां तक मुझे मालूम है, वह अधिकारी रूप से कभी कांगे्रस में शामिल नहीं हुए, फिर भी वह पूरे राष्ट्रवादी थे। जैसा कि आप जानते हैं, स्वर्गीय मौ. मुहम्मदअली जिनकी उपस्थिति का भी आज यहां अभाव है, कांगे्रस के सभापति थे, और इस समय कांगे्रस की कार्य समिति के 15 सदस्यों में 4 सदस्य मुसलमान हैं। स्त्रिायां भी हमारी कांग्रेस की अध्यक्ष रह चुकी हैं। पहली श्रीमती एनी बेसेण्ट थी और दूसरी श्रीमती सरोजिनी नायडू जो कार्य समिति की सदस्य भी हैं, और इस प्रकार जहां हमारे यहां जाति और मजहब का भेद भाव नहीं है, वहां किसी प्रकार का लिंग भेद ननहीं है। ÷कांगे्रस ने अपने आरम्भ से ही अछूत कहलाने वालों के काम को अपने हाथ में ले रखा है। एक समय था जबकि कांगे्रस अपने प्रत्येक वार्षिक अधिवेशन के समय अपनी सहयोगी संस्था की तरह सामाजिक परिषद् का भी अधिवेशन किया करती थी, जिसे स्वर्गीय रानाडे ने अपने अनेकों कामों में एक काम बना लिया था और जिसे उन्होंने अपनी शक्तियां समर्पित की थीं। आप देखेंगे कि उनके नेतृत्व में सामाजिक परिषद के कार्यक्रम में अछूतों के सुधार के कार्य को एक खास स्थान दिया गया था। किन्तु सन् 1920 में कांगे्रस ने एक बड़ा कदम आगे उठाया और अस्पृश्यता निवारण के प्रश्न को राजनीतिक मंच का एक आधार-स्तम्भ बनाकर राजनीतिक कार्यक्रम का एक महत्वपूर्ण अंग बना दिया। जिस प्रकार कांग्रेस हिन्दू मुस्लिम ऐक्ट, और इस प्रकार सब जातियों के परस्पर ऐक्ट, को स्वराज्य प्राप्ति के लिए अनिवार्य समझती थी उसी तरह स्वराज्य प्राप्ति के लिए छुआछूत के पाप को दूर करना भी अनिवार्य समझने लगी। सन् 1920 में कांगे्रस ने जो स्थिति ग्रहण की थी, वह आज भी बनी हुई है; और इस प्रकार कांगे्रस ने अपने आरम्भ से ही अपने को सच्चे अर्थों में राष्ट्रीय सिद्ध करने का प्रयत्न किया है। यदि महाराजागण मुझे आज्ञा देंगे तो मैं यह बतलाना चाहता हूं कि कांगे्रस ने उनकी और भी सेवा की है। मैं इस समिति को याद दिलाना चाहता हूं कि वह व्यक्ति भारत का वृद्ध पितामह ही था। जिसने काश्मीर और मैसूर के प्रश्न को हाथ में लेकर सफलता को पहुंचाया था ओर मैं अत्यन्त नम्रता पूर्वक कहना चाहता हूं कि ये दोनों बड़े घराने श्री दादाभाई नौरोजी के प्रयत्नों के लिए कम ऋणी नहीं है॥ अब तक भी उनके घरेलू और आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप न करके कांगे्रस उनकी सेवा का प्रयत्न करती रही है। मैं आशा करता हूं कि इस संक्षिप्त परिचय से, जिसका दिया जाना मैंने आवश्यक समझा, समिति और कांगे्रस के दावे में दिलचस्पी रखते हैं, वे यह जान सकेंगे कि उसने जो दावा किया है, वह उसके उपयुक्त हैं। मैं जानता हूं कभी कभी वह अपने इस दावे को कायम रखने में असफल भी हुई है, किंतु मैं यह कहने का साहस करता हूं कि यदि आप कांगे्रस का इतिहास देखेंगे तो आपको मालूम होगा कि असफल होने की अपेक्षा वह सफल ही अधिक हुई है और प्रगति के साथ सफल हुई है। सबसे अधिक कांग्रेस मूलरूप में, अपने देश के एक कोने से दूसरे कोने तक, 7,00,000 गांवों में बिखरे हुए करोड़ों मूक, अर्ध नग्न और भूखे प्राणियों की प्रतिनिधि है, यह बात गौण है कि ये लोग ब्रिटिश भारत के नाम से पुकारे जाने वाले प्रदेश के हैं अथवा भारतीय भारत अर्थात् देशी राज्यों के। इसलिए कांगे्रस के मत से प्रत्येक हित, जो रक्षा के योग्य हैं, इन लाखों मूक प्राणियों के हित का साधन होना चाहिए। हां, आप समय- समय पर इन विभिन्न हितों में प्रत्यक्ष विरोध देखते हैं। परन्तु यदि वस्तुतः कोई वास्तविक विरोध हो तो मैं कांगे्रस की ओर से बिना किसी संकोच के यह बता दो चाहता हूं कि इन लाखों मूम प्राणियों के हित के लिए कांगे्रस प्रत्येक हित का बलिदान कर देगी। इसलिए यह आवश्यक रूप से किसानों की संस्था है और वह अधिकाधिक उनकी बनती जा रही है। आपको और कदाचित इस समिति के भारतीय सदस्यों को भी, यह जानकर आश्चर्य होगा कि कांगे्रस ने आज अखिल भारतीय चर्खा संघ नामक अपनी संस्था द्वारा करीब दो हजार गांवों की लगभग 50 हजार स्त्रियों को (अब यह संख्या 1,80,000 है) रोजगार में लगा रखा है, और इनमें सम्भवतः 50 प्रतिशत मुसलमान स्त्रियां हैं। उसमें हजारों अछूत कहाने वाली जातियों की भी है। इस तरह हम इस रचनात्मक कार्य के रूप में इन गांवों में प्रवेश कर चुके हैं और 7,00,000 गांवों में प्रत्येक गांव में, प्रवेश करने का यत्न किया जा रहा है। यह काम यद्यपि मनुष्य की शक्ति के बाहर का है; फिर भी यदि मनुष्य के प्रयत्न से हो सकता है, तो आप कांगे्रस को इन सब गांवों में फैली हुई और उन्हें चर्खे का सन्देश सुनाती हुई देखेंगे। कांग्रेस कैसी महान् राष्ट्रीय संस्था है, इसका बहुत अच्छा वर्णन संक्षेप में गांधी जी ने किया है। यदि कांगे्रेस ने और कुछ नहीं किया तो कम से कम इतना जरूर किया कि उसने अपना गन्तव्य स्थान खोज लिया है और राष्ट्र के विचारों और प्रवृत्तियों को एक ही बिन्दु पर लाकर ठहरा दिया है। उसने भारत के करोड़ों निरीह और बेकस लोगों के दिलों में एक जागृति पैदा कर दी है; उनके अन्दर एकता, आशा और आत्म विश्वास की संजीवनी डाल दी है। कांगे्रस ने भारतवासियों के विचारों और आकांक्षाओं को एक स्पष्ट राष्ट्रीय रूप दे दिया है, जिसके द्वारा उन्होंने अपनी राष्ट्रभाषा और राष्ट्रीय साहित्य को, अपने सर्वसामान्य आकांक्षाओं ओर आदर्शों तक को खोज निकाला है। परन्तु यहां कहना होगा कि उसके जीवन के ये पिछले 50 वर्ष अबाध और असानी से नहीं बीते हैं। उसमें कई उतार-चढ़ाव आये हैं। उसमें लोगों की आशा निराशायें, उनके आन्दोलनों और प्रयासों में मिली सफलता असफलता सब का इतिहास छिपा हुआ है। स्वाधीनता की ललक पुष्प की अभिलाषा माखनलाल चतुर्वेदी चाह नहीं, मैं सुरबाला के गहनों में गूंथा जाऊं, चाह नहीं, प्रेमीमाला में बिंध प्यारी को ललचादूं, चाह नहीं, सम्राटों के शव पर हे हरि, डाला जाऊं, चाह नहीं, देवों के सिर पर चढूं भाग्य पर इठलाऊं मुझे तोड़ देना वनमाली, उस पथ में देना फेंक, मातृभूमि पर शीश चढ़ाने जिस पथ पर जाएं वीर अनेक विलासपुर : 18 फरवरी, 1922, युगचरण बलिदान अंग्रेजी न्यायाधीश ने भारतीय क्रान्तिकारी को सज +ा सुनाते हुए कहा, ÷÷तुम्हारे लिए दो सज+ाएं हैं - एक फांसी और दूसरी बीस वर्ष का कारावास।÷÷ बताओ कौन-सी सजा पसंद है? ÷÷फांसी÷÷ ...मुस्कराते हुए वीर युवक ने उत्तर दिया। ÷÷क्या तुम्हें जीवन प्यारा नहीं युवक? ऐसा क्यों कहते हो?÷÷ उत्तर मिला ÷÷नहीं, मुझे जीवन से देश अधिक प्यारा है। कल मर कर दोबारा जन्म लूंगा और बीस वर्ष बाद जवान होकर आततायी से फिर लडूंगा। बीस वर्ष की सज+ा भोगकर तो मैं वृद्ध हो जाऊंगा और मेरी संघर्ष शक्ति समाप्त हो जायेगी। मेरी आंखों के सामने ही तुम मेरे देश को अन्याय के पाटों के बीच पीसते रहोगे। दूसरे दिन बलिदान मुस्करा रहा था। कांग्रेस के प्रारम्भिक पचास वर्ष डा0 राजेन्द्र प्रसाद हमारी राष्ट्रीय महासभा (कांग्रेस) पचास वर्ष पूर्व, पहले-पहल, कुछ थोड़े-से प्रतिनिधियों की उपस्थिति में, बम्बई में हुई थी। जो लोग वहां उपस्थित थे, वे निर्वाचित प्रतिनिधि तो शायद ही कहे जा सकें, परन्तु थे सच्चे जन- सेवक। बस, तभी से यह भारतीय जनता के लिए स्वराज्य प्राप्ति का प्रयत्न कर रही है। यह ठीक है कि प्रारम्भ में इसका लक्ष्य अनिश्चित था, लेकिन हमेशा इसने शासन के ऐसे प्रजातंत्री रूप पर जोर दिया है, जो भारतीय जनता के प्रति जिम्मेवार हो और जिसमें इस विशाल देश में रहने वाली सब जातियों एवं श्रेणियों का प्रतिनिधित्व हो। इसका आरंभ इस आशा और विश्वास को लेकर हुआ था कि ब्रिटिश राजनीतिज्ञता और ब्रिटिश सरकार समयानुसार ऊंचे उठेंगे और ऐसी संस्थाओं की स्थापना करेंगे, जो सचमुच प्रतिनिधिक हों और जिनसे भारतीय जनता को भारत के हित की दृष्टि से भारत का शासन करने का अधिकार मिले। कांग्रेस का प्रारम्भिक इतिहास इस श्रद्धा-युक्त विश्वास के निदर्शक प्रस्तावों और भाषणों से ही भरा है। कांग्रेस की जो मांगे हैं, वे भी ऐसे प्रस्तावों के ही रूप में हैं, जिनमें यह सुझाया गया है कि क्या तो सुधार होने चाहिएं और कौन सी आपत्तिजनक कार्रवाइयां रद होनी चाहिएं; और उन सब का आधार यह आशा ही रही है, कि यदि ब्रिटिश-पार्लमेन्ट को भारत की इस स्थिति का तथा भारतीयों की इच्छा का भलीभांति पता लग जाए तो वे गलतियों को दुरुस्त करके अंत में हिन्दुस्तान को स्वशासन की बेशकीमत बखशीश दे देंगे, लेकिन हिन्दुस्तान और इंग्लैण्ड में ब्रिटिश सरकार ने जो कार्रवाइयां की, उनसे यह आशा और विश्वास धीरे-धीरे पर संपूर्ण रूप में नष्ट हो चुके हैं। ज्यों-ज्यों हमारी राष्ट्रीय जागृति बढ़ती गई, त्यों-त्यों ब्रिटिश सरकार का रुख भी कठोर से कठोर होता गया। ब्रिटिश शासन की सदिच्छाओं पर प्रारंभ में हमारा जो विश्वास था, उसमें लॉर्ड कर्जन के, जिन्होंने बंगाल को विभक्त कर दिया था, शासनकाल में धक्का लगा। इस दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति के विरुद्ध जो महान् आन्दोलन हुआ वह सर्व-साधारण में उठती हुई राष्ट्रीय- जागृति की लहर का ही द्योतक था, जोकि बीसवीं सदी के आरंभ में रूस पर जापान की विजय जैसी विश्वव्यापी घटनाओं से कुछ कम प्रभावित नहीं थी। फिर भी अंग्रेजों पर से हमारा विश्वास बिलकुल उठ नहीं चुका था; इसलिए महायुद्ध के समय कुछ तो इस विश्वास के ही कारण, जो कि बंग-भंग रद हो जाने से फिर सजीव हो गया था और कुछ सारी परिस्थिति को अच्छी तरह न समझ सकने की वजह से, ब्रिटिश साम्राज्य के संकट के समय उसे सहायता देने की ब्रिटिश सरकार की पुकार पर देश ने उसका साथ दिया। भारत ने इस संकट-काल में जो बहुमूल्य सहायता की, उसकी सब ब्रिटिश- राजनीतिज्ञों ने सराहना की, और भारतीयों के मन में यह आशा पैदा कर दी गई कि जो युद्ध प्रत्यक्षतः राष्ट्रों के स्वभाग्य निर्णय के सिद्धान्त तथा प्रजातंत्री-शासन को सुरक्षित करने के उद्देश्य से लड़ा जा रहा है उसके फलस्वरूप भारत में भी उत्तरदायी शासन की स्थापना हो जाएगी। 1917 में ब्रिटिश-सरकार की ओर से भारत-मंत्री ने जो घोषण की, जिसमें थोड़ा- थोड़ा करके स्वशासन देने का आश्वासन दिया गया था, उस पर हिन्दुस्तानियों में मतभेद उत्पन्न हुआ; और जैसे-जैसे भारत-मंत्री व वाइसराय-द्वारा की गई इस संबंधी जांचों का परिणाम और उस बिल का स्वरूप, जोकि आखिर 1920 में भारतीय-शासन- विधान (गवर्नमेण्ट ऑफ इंडिया एक्ट) बन गया, प्रकट होते गए, वैसे-वैसे वह मतभेद भी उत्तरोत्तर तीव्र होता चला गया। बिल अभी बन ही रहा था कि महायुद्ध समाप्त हो गया, और उसमें ब्रिटिश-सरकार की जीत रही। तब हिन्दुस्तान को यह महसूस होने लगा कि युद्ध के कारण यूरोप में ब्रिटिश सरकार को जो कठिनाई उत्पन्न हो गई थी, युद्ध में उसके जीत जाने से, चूंकि अब वह दूर हो गई है, हिन्दुस्तान के प्रति उसका रुख बदल गया है और पहले से कहीं खराब हो गया है। खिलाफत के मामले में जो कुछ हुआ, जिसे कि मुसलमानों के प्रति विश्वासघात कहा गया, और (देशव्यापी सर्वसम्मत विरोध के होते हुए भी) उन बिलों के स्वीकृत कर लिए जाने से, जोकि रौलट-बिलों के नाम से मशहूर हैं और जिनके द्वारा जन- साधारण को स्वतंत्र नागरिकता के मौलिक अधिकारों से वंचित करनेवाली भारत-रक्षा-विधान की उन कठोर धाराओं को फिर से अमल में लाने की व्यवस्था की गई थी जिन्हें कि महायुद्ध के समय ढीला छोड़ दिया गया था, इस भावना को और भी पुष्टि और दृढ़ता मिली। इन बातों से स्वभावतः देशभर में जोरदार हलचल मच गई और दक्षिण-अफ्रीका में तथा छोटे पैमाने पर भारत के खेड़ा व चंपारन जिलों में जिस सत्याग्रह का प्रयोग किया जा चुका था, उसे पहली बार महात्मा गांधी ने इन तथा अन्य शिकायतों से देश के मुक्ति पाने के उपाय के तौर पर प्रस्तुत किया। दुर्भाग्य-वश इस सिलसिले में पंजाब और अहमदाबाद में जनता की ओर से कुछ उत्पाद हो गए, जिससे लोगों के जान-माल का नुकसान हुआ और जलियांवाला- बाग-हत्याकाण्ड व पंजाब में फौजी शासन के भीषण दृश्य सामने आए। स्वभावतः देशभर में इससे हलचल मच गई और रोष छा गया। इन दुर्घटनाओं की जांच के लिए हण्टर- कमिटी नियुक्त हुई, लेकिन उसकी रिपोर्ट भी उस हलचल और रोष को शांत न कर सकी; उलटे पार्लमेण्ट में उस रिपोर्ट पर जो बहस हुई, उससे वह और भी प्रबल हो गया। तब असहयोग- आन्दोलन शुरू हुआ। इसमें एक ओर तो सरकारी उपाधियों के त्याग और सरकारी कौंसिलों, सरकार-द्वारा स्वीकृत शिक्षणालयों, अदालतों तथा विदेशी कपड़े के बहिष्कार का कार्यक्रम रखा गया, और दूसरी ओर जगह-जगह कांग्रेस-कमिटियों की स्थापना, कांग्रेस-सदस्यों की भर्ती, तिलक- स्वराज्य-कोष के लिए रुपया इकट्ठा करना, राष्ट्रीय शिक्षणालयों की स्थापना, ग्रामवासियों के झगड़े निपटाने के लिए पंचायतों की स्थापना तथा हाथ की कताई- बुलाई को पुनर्जीवित करते हुए क्रमशः सविनय- अवज्ञा और लगान-बंदी तक पहुंच जाने का कार्यक्रम रखा गया। कांग्रेस-विधान में परिवर्तन करके कांग्रेस का लक्ष्य ÷शान्तिपूर्ण और उचित उपायों से स्वराज्य-प्राप्ति÷ रखा गया। इससे देशभर में जागृति की लहर छा गई और सरकार ने भी अपना दमन-चक्र जारी कर दिया। देखते-देखते 1921 के अंत तक हजारों स्त्री-पुरुष, जिनमें देश के कुछ अत्यंत प्रतिष्ठित नेता भी थे, जेलखानों में जा पहुंचे। सरकार के साथ समझौते की बातचीत भी चली, पर वह सफल न हुई। मगर इसी दर्मियान युक्त-प्रान्त के चौरीचौरा स्थान में भयंकर उत्पात हो जाने के कारण, बारडोली में करबंदी के आन्दोलन का जो कार्यक्रम तय हुआ था, उसे स्थगित कर देना पड़ा। इसके बाद एक-एक करके असहयोग- कार्यक्रम की दूसरी बातें भी उत्पात कर दी गईं और कांग्रेसवादी कौंसिलों में प्रविष्ट हुए। 1920 के शासन-विधान के अमल की जांच के लिए ब्रिटिश-पार्लमेण्ट ने जो कमीशन नियुक्त किया, जोकि साइमन- कमीशन के नाम से मशहूर है, उसमें हिन्दुस्तानियों के न रखे जाने से देश में फिर हलचल मची। तब, अन्य सार्वजनिक संस्थाओं के साथ मिलकर, कांग्रेस ने सरकार की स्वीकृति के लिए, भारत के लिए ऐसा शासन-विधान बनाया, जिसमें भारत का लक्ष्य ब्रिटिश- साम्राज्य के अन्य उपनिवेशों के समान स्थिति (डोमिनियन स्टेटस) की प्राप्ति रखा गया, लेकिन सरकार ने इसका कोई पर्याप्त जवाब नहीं दिया। तब दिसम्बर, 1929 में, लाहौर के अपने अधिवेशन में, कांग्रेस ने अपना लक्ष्य बदलकर शान्तिपूर्ण और उचित उपायों से पूर्ण स्वराज्य (पूर्ण स्वाधीनता) की प्राप्ति कर दिया और 1930 के आरां में अनैतिक कानूनों की सविनय- अवज्ञा तथा कर-बंदी का आन्दोलन संगठित किया। इंग्लैण्ड की सरकार ने एक ओर तो लंदन में एक परिषद् का आयोजन किया, जिसमें भारत के लिए शासन-विधान बनाने के संबंध में परामर्श देने के लिए कुछ हिन्दुस्तानियों को नामजद किया गया, और दूसरी ओर भारत में सविनय-अवज्ञा- आंदोलन को कुचलने के लिए अनेक अत्यंत भीषण आर्डिनेन्सों-सहित दमनकारी उपाय अख्तियार किए गए। मार्च, 1931 में सरकार की ओर से वाइसराय लॉर्ड अर्विन और कांग्रेस की ओर से महात्मा गांधी के बीच एक समझौता हुआ, जिसके फल- स्वरूप सविनय- अवज्ञा स्थगित कर दी गई और 1931 के आखिरी दिनों में महात्मा गांधी लंदन में होने वाली गोलमेज-परिषद में शामिल हुए। लेकिन, जैसा कि खयाल था, इस परिशद से कोई नतीजा हासिल न हुआ और 1932 की शुरुआत में ही कांग्रेस को फिर से आंदोलन शुरू कर देना पड़ा, जो 1934 तक चलता रहा। 1934 में वह फिर स्थगित कर दिया गया। 1930 और 1932 इन दोनों बार के आंदोलनों में हजारों स्त्री- पुरुष और बच्चे तक जेलों में गए, लाठी- प्रहार तथा अन्य प्रकार के कष्टों को उन्होंने सहा, और अपनी संपत्ति का नुकसान भी बर्दाश्त किया। बहुत से, सरकारी सेना- द्वारा भीड़ पर चलाई गई गोलियों के कारण मारे भी गए। सत्याग्रहियों ने इस अवसर पर अपने संगठन और कष्ट-सहन की अद्भुत शक्ति का परिचय दिया और भारी से भारी उत्तेजनाओं के बीच भी कुल मिलाकर, पूरी तरह अहिंसक ही रहे। कांग्रेस संगठन ने सरकार के भारी आक्रमण के बावजूद कायम रहकर सिद्ध कर दिया कि वह निर्जीव नहीं है और अपने को समयानुकूल बनाने की उसमें पर्याप्त क्षमता है। यह ठीक है कि देश का जो लक्ष्य है वह पूर्ण स्वराज्य अभी (1935 में) हमें प्रापत नहीं हुआ, परंतु इसमें संदेह नहीं कि देश इस अग्नि परीक्षा में प्रशंसनीय रूप से पार उतरा है। कराची के अधिवेशन में कांग्रेस ने एक प्रस्ताव द्वारा सब भारतवासियों व उनके कुछ मौलिक का आश्वासन दिया है और देश के सामने एक आर्थिक एवं सामाजिक कार्यक्रम प्रस्तुत किया है। उसमें यह स्पष्ट कर दिया गया है कि जन- साधारण के शोषण का अंत करने के लिए यह आवश्यक है कि राजनीतिक स्वतंत्रता में भूखों मरने वाले करोड़ों लोगों की वास्तविक आर्थिक स्वतंत्रता का भी समावेश हो, और भाषण, सम्मिलन, जान-माल, धर्म तथा अंतरात्मा के आदेश आदि संबंधी स्वतंत्रता के मौलिक अधिकारों की घोषणा कर दी गई है। यह भी निर्दिष्ट कर दिया गया है कि कल- कारखानों में काम करने वालों के लिए काम की स्वास्थ्यप्रद परिस्थिति, काम के मर्यादित घण्टे, आपसी झगड़ों के फैसले के लिए उपयुक्त संगठन और बुढ़ापे, बीमारी व बेकारी के आर्थिक संकटों से संरक्षण तथा मजदूर संघ बनाने के उनके अधिकार को कायम रखने के रूप में उनके हितों का ख्याल रखा जाएगा। किसानों को इसने आश्वासन दिया है कि यह लगान-मालगुजारी में उपयुक्त कमी कराकर और अनुत्पादक जमीनों की लगान-मालगुजारी माफ कराकर तथा छोटी- छोटी जमीनों के मालिकों को उस कमी के कारण जो नुकसान होगा, उसके हिसाब से उचित और न्याय छूट की सहायता देकर यह उनके खेती-संबंधी भार को हल्का करेगी। खेती-बाड़ी से होने वाली आमदनी पर, उसके एक उचित न्यूनतम परिमाण से ऊपर, इसने क्रमागत कर लगाने की भी व्यवस्था की है। साथ ही एक निश्चित रकम से अधिक आमदनी वाली संपत्ति पर उत्तरोत्तर बढ़ता जानेवाला विरासत का कर लगाने, फौजी व मल्की शासन के खर्चे में भारी कमी करने और सरकारी कर्मचारियों की तनख्वाह 500 रुपये महीने से ज्यादा न रखने के लिए कहा है। इसके अलावा एक आर्थिक और सामाजिक कार्यक्रम भी प्रस्तुत किया गया है, जिसमें विदेशी कपड़े का बहिष्कार, देशी उद्योग-धंधों का संरक्षण, शराब तथा अन्य नशीली चीजों का निषेध; बड़े-बड़े उद्योगों पर सरकारी नियंत्रण, काश्तकारों का कर्जदारी से उद्धार, मुद्रा और विनिमय की नीति का देश के हित की दृष्टि से संचालन और राष्ट्र-रक्षा के लिए नागरिकों को सैनिक शिक्षण देने का निर्देश है। कांग्रेस के अंतिम अधिवेशन में, जोकि अक्तूबर 1934 में बम्बई में हुआ था, कौंसिल-प्रवेश की नीति को स्वीकार कर लिया गया है और देश के सामने रचनात्मक कार्यक्रम रखा गया है जिसमें हाथ की कताई-बुनाई को प्रोत्साहन एवं पुनर्जीवन देने, उपयोगी ग्रामीण तथा अन्य छोटी दस्तकारियों (गृह- उद्योगों) की उन्नति करने, आर्थिक, शिक्षणात्मक सामाजिक एवं स्वास्थ्य-विज्ञान की दृष्टि से ग्रामीण-जीवन का पुनर्निमाण करने, अस्पृश्यता का नाश करने, अन्तर्जातीय एकता की वृद्धि करने, संपूर्ण मद्य-निषेध, राष्ट्रीय शिक्षा, वयस्क स्त्री- पुरुषों में उपयोगी ज्ञान का प्रसार करने, कल- कारखानों में काम करने वाले मजदूरों व खेती करने वाले किसानों का संगठन और कांग्रेस संगठन को मजबूत बनाने की बातें भी हैं। कांग्रेस विधान का संशोधन करके, नये विधान में, प्रतिनिधियों की संख्या घटाकर कांग्रेस-रजिस्टर में दर्ज जितने सदस्य हों उनके अनुपातानुसार कर दी गई है; साथ ही इस बात पर भी जोर दिया गया है कि कांग्रेस- कमेटियों के सब निर्वाचित-सदस्य शारीरिक श्रम करने और आदतन खादी पहनने वाले हों। इस प्रकार कांग्रेस कदम-ब-कदम आगे बढ़ती गई है और राष्ट्रीय हलचल के हरेक क्षेत्र में उसने अपना प्रवेश कर लिया है। इस समय वह रचनातमक कार्य में लगी हुई है जिससे न केवल जन-साधारण की माली हालत ही ठी होगी, बल्कि उसको पूरा करने से उनमें वह आत्मविश्वास भी जागृत होगा जिससे वे पूर्ण-स्वराज्य प्राप्त कर सकेंगे। एक छोटी संस्था के रूप में आरंभ होकर अब यह इतनी प्रशस्त हो गई है कि सारे देश में इसकी शाखाएं हैं और देश के सर्व-साधारण का विश्वास इसको प्राप्त है। इसके आदेश पर देश के सब श्रेणियों के लोगों ने स्वराज्य- प्राप्ति के लिए बहुत बड़े पैमाने पर बलिदान किया है; और इसके कार्यों व इसकी सफलताओं का राष्ट्र की एक महान थाती हे, जिसकी रक्षा और वृद्धि करना हरेक हिन्दुस्तानी का कर्तव्य होना चाहिए। स्वतंत्रता की उस लड़ाई में, जो अभी भी हमें लड़ना बाकी है, निश्चय ही यह अधिक-से-अधिक भाग लेती रहेगी। यह समय सुस्ताने या विश्राम करने का नहीं है। अभी तो बहुत- सा काम करने को बाकी पड़ा है, जिसके लिए बहुत सब्र के साथ तैयारी करने, लगातार बलिदान करने और अटूट दृढ़-निश्चय की आवश्यकता है। पूर्ण- स्वराज्य से कुछ कम पर हम हर्गिज संतोष न करेंगे। साथ ही, कृतज्ञता और सम्मान के साथ, हमें उन लोगों की सेवाओं का भी स्मरण करना चाहिए, जिन्होंने, कि इस शक्तिशाली संस्था का बीजारोपण किया और अपने निस्स्वार्थ परिश्रम एवं अपनी कुरबानियों से इसका पोषण किया। पचास साल पहले जो छोटा-सा बीज बोया गया था वह अब बढ़कर एक मजबूत वटवृक्ष बन गया है, जिसकी शाखा- प्रशाखाएं इस विशाल देश भर में फैल गई हैं और अब अगणित नर-नारियों की कुरबानियों के रूप में उसमें कलियां फूटी हैं। अब जो लोग बाकी बचे हैं, उनका फर्ज है कि वे अपनी सेवा और कुर्बानियों से इसका पोषण करें, ताकि प्रकृति ने जिस उद्देश्य से इसको बनाया है वह पूर्ण हो, इसमें फल लगें और उनसे भारतवर्ष स्वतंत्र एवं समृद्ध देश बन जाए। 12 दिसम्बर, 1935 युद्धकाल और पंजाब पर अत्याचार जुलाई 1914 में प्रथम विश्वयुद्ध छिड़ गया इन दिनों कांग्रेस के पुराने नेता जनसमर्थन खोते जा रहे थे। 1915 में गोखले का निधन हो गया और इसी वर्ष सर फिरोजशाह मेहता का भी देहांत हो गया वाचा क्षीण पड़ चुके थे। सुरेन्द्र नाथ बैनर्जी का वर्चस्व भी घट गया था लाला लाजपत राय अमरीका में निर्वासित थे। विश्व विख्यात श्रीमती बेसंट जो एक सामाजिक विद्रोही, गरीबों की मित्र तथा भारत के प्रति अपने अगाध स्नेह के कारण अपनी एक अलग छवि स्थापित कर चुकी थीं, अब भारतीय राजनीति के मंच पर एक नवशक्ति के रूप में उदय हो रही थीं, लोकमान्य तिलक लंबा कारावास भुगतने के पश्चात मांडले से लौट आए थे। गांधीजी दक्षिण अफ्रीका से अभी लौटे ही थे। वे अभी इतने लोकप्रिय नहीं हुए थे। अपने ÷÷राजनीतिक गुरु÷÷ गोखले के मार्गनिर्देश में वे तत्कालीन परिस्थितियों का अध्ययन करने के लिए देश का भ्रमण कर रहे थे। 1915 में बंबई अधिवेशन में गांधीजी को विषय समिति (सबजैक्ट्स कमेटी) में चुना नहीं जा सका। लोकमान्य - लोकप्रिय नेता के रूप में लोकमान्य तिलक कांग्रेस के गरम पंथियों तथा नरमपंथियों के बीच एकता लाने के प्रयासों में जुटे हुए थे ताकि स्वराज का लक्ष्य प्राप्त करने के लिए समूची कांग्रेस की शक्ति लगाई जा सके। इस दिशा में सफलता प्राप्त न होने पर 1915 में लोकमान्य ने पूना में होमरूल लीग की स्थापना की। वे सच्चे अर्थों में जनता के प्रिय नेता थे लेकिन अंग्रेज सरकार उन्हें अपना घोर शत्रु मानती थी और आए दिन उनके विरुद्ध अभियोग चलाती रहती। वे साठ वर्ष के हो चुके थे। लंबे कारावासों की कठोरताओं से उनका शरीर दुर्बल हो गया था। वे दूर-दूर तक यात्राएं तथा सभाएं करने के योग्य नहीं रहे थे। अगर वे ऐसा कर पाते तो वे महाराष्ट्र के ही नहीं बल्कि पूरे भारत के बेताज बादशाह बन गए होते। श्रीमती बेसंट के साथ ऐसी कोई समस्या नहीं थी। उन्होंने भी एक अन्य ÷÷होम रूल फॉर इंडिया लीग÷÷ की स्थापना की जिसका मुख्यालय मद्रास में था। 1916 में कांग्रेस लीग केंद्र लगातार सफलता प्राप्त कर रहे थे। 1916 में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति की बैठक नरमपंथी नेता पंडित मोतीलाल नेहरू के निवास पर हुई। उन दिनों पंडित मोतीलाल प्रसिद्धि के शिखर पर नहीं पहुंचे थे। 1916 में लोकमान्य तिलक, सूरत के बाद पहली बार, लखनऊ अधिवेशन में शामिल हुए। उन के साथ भारी संख्या में उनके दल के कार्यकर्ता भी प्रतिनिधि बन कर आए। लखनऊ अधिवेशन की विशेषता यह रही कि इस अधिवेशन में लीग तथा कांग्रेस और नरमपंथियों तथा गरमपंथियों के बीच एकता हो गई। इसी अधिवेशन में स्वराज की योजना की रूपरेखा तैयार की गई। अधिवेशन में सुरेन्द्रनाथ बैनर्जी तथा रासबिहारी घोष जैसे नरमपंथी तथा महमूदाबाद के राजा, मज+हर-उल-हक और युवा जिन्ना जैसे मुस्लिम नेता शामिल हुए। श्रीमती बेसंट अपनी दो निकट सहयोगियों अरुण्डेल तथा बाडिया के साथ आईं जिन्होंने होमरूल के झंडे उठा रखे थे। गांधीजी और पोलक भी इस अधिवेशन में उपस्थित थे। चंपारन से कुछ लोग गांधीजी को वहां आमंत्रित करने के लिए आए। अधिवेशन में चंपारन के खेतीहरों के बारे में एक प्रस्ताव पास किया गया। कांग्रेस लीग योजना स्वीकार कर ली गई तथा भारत में स्वशासन के लिए उसे एक स्वतंत्र उपनिवेश का दर्जा देने की घोषण करने तथा वचन देने के लिए कहा गया। होमरूल आंदोलन और श्रीमती एनीबेसेन्ट इस अधिवेशन की एक उल्लेखनीय बात यह भी थी कि भारतीय रक्षा अधिनियम तथा 1818 के बंगाल रेग्यूलेशन ऐक्ट 3 के विरुद्ध भी एक प्रस्ताव पारित किया गया। यह प्रस्ताव पारित किया गया। यह प्रस्ताव देश के बारह हो रही घटनाओं की प्रतिध्वनि था। 1917 में श्रीमती बेसंट ने पूरे देश में होमरूल आंदोलन पूरे जोर से शुरू किया। श्रीमती बेसेंट तथा उन के आंदोलन को और भी लोकप्रिय बना दिया। इस नजरबंदी ने श्रीमती बेसंट तथा उन के आंदोलन को और भी लोकप्रिय बना दिया। नजरबंद किए लोगों की रिहाई के लिए सत्याग्रह छेड़ने की योजना तैयार की गई। वास्तव में यह जन जागृति विश्वयुद्ध के कारण महान् विश्व शक्तियों के उदय का परिणाम थी। इस विश्व युद्ध में, भारी संख्या में भारतीय सैनिकों के तौर पर विदेशों में गए और उन्होंने फ्रांस, फ्रलैंडर्स तथा युद्ध के अन्य अनेक मोर्चों पर अपने शौर्य की पताकाएं फहराईं। पश्चिमी ताकतों तथा अंग्रेजों की श्रेष्ठता का भ्रम टूट गया था। भारत में मुट्ठी भर क्रांतिकारी विदेशी शासन के विरुद्ध अकेले लेकिन पूरे साहस के साथ संघर्ष कर रहे थे। आयरिश लोगों का आंदोलन उत्साह तथा प्रेरणा का एक अन्य स्रोत था। सरकारी द्वारा सख्ती युद्ध के हालात, मंहगाई, युद्ध के लिए नए सिपाहियों की भर्ती तथा अन्य सामग्री जुटाने के लिए जनता पर सरकार द्वारा बलप्रयोग (जैसे कि जनरल ओडायर ने पंजाब में किया) इत्यादि से लोगों के मन में सरकार के प्रति आक्रोश उठ रहा था। मुसलमानों में भी, जो अब तक अलग-थलग थे, असंतोष व्याप्त था। क्योंकि तुर्की मित्र राष्ट्रों की तरफ नहीं था। यह वह दौर था जब इकबाल, शिबली और आजाद जैसी हस्तियों ने मुसलमानों की बेचैनी को अभिव्यक्ति दी। मौलाना आजाद का ÷÷अल- हिलाल÷÷, जफर अली का ÷÷जमींदार÷÷, मुहम्मद अली का ÷÷कामरेड÷÷ तथा ÷÷हमदर्द÷÷ मज+हब और सियासत पर एक नया नजरिया पेश कर रहे थे। इस प्रवृत्ति ने 1916 में मुस्लिम लीग को कांग्रेस की विचारधारा के साथ ला खड़ा किया। सरकार इन नई खतरनाक ताकतों से बेखबर नहीं थी। विशेष अधिनियम पारित किए गए और उग्र नेताओं को या तो जेल भेज दिया गया था उन्हें नजरबंद कर दिया गया। अली बंधुओं तथा आजाद को नजरबंद किया गया तथा जिन व्यक्तियों पर क्रांतिकारियों से जुड़े होने का संदेह था उन पर मुकदमें चलाए गए। नरमपंथी नेताओं को अपनी ओर करने की कोशिश की गई। सरकार ने जल्दी में एक घोषणा जारी की जिस में गृहमंत्री मौंटेग्यू ने कहा कि भारत में ब्रिटिश शासन का उद्देश्य स्वायत्तशासी संस्थाओं का धीरे- धीरे विकास करना है ताकि धीरे-धीरे एक उत्तरदायी भारत सरकार का गठन किया जा सके जो ब्रिटिश साम्राज्य का ही एक अभिन्न अंग हो। ÷÷मौंटेग्यू चेम्सफोर्ड सुधारों÷÷ के प्रति ÷÷नरमपंथियों का समर्थन जुटाने÷÷ के इरादे से मौंटेग्यू भारत यात्रा पर आए। श्रीमती बेसेंट और उनके सहयोगियों को रिहा कर दिया गया। लीग तथा कांग्रेस की कार्यकारिणी की 6 अक्तूबर को इलाहाबाद में बैठक हुई और सत्याग्रह छेड़ दिया गया। सी.वाई.चिंतामणि सहित 12 सदस्यों की समिति गठित की गई। समिति से कहा गया कि वह गृहमंत्री तथा वायसराय से मिले और कांग्रेस लीग योजना पर उन का समर्थन प्राप्त करे। 1917 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में श्रीमती बेसेंट (हल्के से विरोध के बाद) अध्यक्ष चुनी गईं। कलकत्ता अधिवेशन में कांग्रेस लीग योजना का समर्थन किया गया और उत्तरदायी सरकार की मांग की गई। ÷÷इस पूर्ण ध्येय को एक समय सीमा के भीतर प्राप्त किया जाएगा तथा यह समय-सीमा किसी निकटतम तिथि पर विधि- अनुसार निश्चित की जाएगी। इसी अधिवेशन में तिरंगा ध्वज अपनाया गया। अभी तक यह होम रूल लीग का ध्वज था। कलकत्ता अधिवेशन में एक अन्य प्रस्ताव पारित कर के रौलेट समिति नियुक्त किए जाने तथा भारतीय रक्षा अधिनियम और 1818 का रेग्यूलेशन 3 का अधिकाधिक प्रयोग करने की निंदा की गई। श्रीमती बेसेंट ऐसी पहली कांग्रेस अध्यक्ष थीं जिन्होंने इस नियम का पालन किया कि वार्षिक अधिवेशन का अध्यक्ष पूरे वर्ष तक कांग्रेस का अध्यक्ष रहेगा। उन्होंने भारत तथा इंग्लैंड में प्रचार कार्य तथा लोगों को शिक्षित करने की अपनी गतिविधियां जोरों से जारी रखीं। इसी दौरान भारतीय रक्षा अधिनियम का हर स्थान पर कड़ाई से प्रयोग किया गया। 1917 में गांधीजी चंपारन में व्यस्त थे। उन्होंने राजेन्द्र प्रसाद जैसे अपने अन्य सहयोगियों को बताया कि स्वराज के लिए वास्तविक संघर्ष तो चंपारन में किया जा रहा है। बाद में वे वायसराय की युद्ध परिषद में शामिल हो गए। लोकमान्य तिलक को भी नए सिपाहियों की भर्ती के काम पर लगाया गया हालांकि सरकार उन पर विश्वास नहीं करती थी। अगस्त 1918 में लोकमान्य तिलक ने गांधीजी को 50,000 रुपये का चैक भेजा और कहा कि अगर वे युद्ध के लिए 5000 मराठों को भर्ती न कर सके तो यह रकम जब्त कर ली जाए लेकिन शर्त यह होगी कि गांधीजी सरकार से यह वचन लें कि भारतीयों को भी सेना में कमीशन दिया जाएगा यानी उन्हें कमीशन्ड अफसर के रूप में भर्ती किया जाएगा। मौंटेग्यू चेम्सफोर्ड रिपोर्ट जून 1918 में प्रकाशित की गई। रिपोर्ट के बारे में कांग्रेस जनों में तीव्र मतभेद हो गए। अगस्त 1918 में बंबई में एक विशेष अधिवेशन बुलाया गया। अधिवेशन में इन सुधारों को असंतोषजनक बताया गया और कांग्रेस लीग योजना लागू करने की मांग फिर दोहराई गई। लेकिन विभिन्न मतभेदों को सुलझा लिया गया, अतः अधिकतर कांग्रेसजनों में एकता बनी रही। फिर भी अधिकांश नरमपंथी नेताओं ने बंबई अधिवेशन में भाग नहीं लिया। बाद में उन्होंने ÷÷द लिबरल÷÷ पार्टी नाम से अपना एक नया दल बना लिया। मुस्लिम लीग ने भी अपना अधिवेशन बंबई में किया और उसने भी इस अधिवेशन में कांग्रेस के निर्णयों के अनुरूप ही फैसले किए। युद्ध का अंतिम वर्ष बहुत महत्वपूर्ण था। सरकार की दमनकारी नीतियां दिनों दिन अधिक उग्र होती जा रही थीं। समाचार पत्र अधिनियम कड़ाई से लागू किया गया। लोकमान्य तिलक तथा श्रीमती बेसेंट की गतिविधियों पर प्रतिबंध लगा दिए गए। बंगाल में नजरबंद किए गए युवकों की संख्या तीन हजार तक पहुंच गई। लोगों पर भारी अत्याचार किए जा रहे थे और हर तरफ आक्रोश उमड़ रहा था, विशेष रूप से पंजाब में युद्ध के लिए सरकार द्वारा जबरन भर्ती और चंदा वसूले जाने के कारण चारों ओर बेचैनी व्याप्त थी। रौलेट समिति अपनी रिपोर्ट तथा सिफारिशें जारी कर चुकी थी। बंबई के बाद कांग्रेस अधिवेशन दिल्ली में हुआ। लोकमान्य तिलक को अध्यक्ष चुना गया लेकिन चूंकि वे सर वेलेंटाउन चिरॉल के साथ अपने मुकदमे के कारण लंदन में उलझे हुए थे। अतः उहोंने विवशता प्रकट कर दी। उन के स्थान पर पंडित मदनमोहन मालवीय को अध्यक्ष बनाया गया। दिल्ली अधिवेशन शुरू होने तक युद्ध समाप्त हो चुका था। मित्र राष्ट्रों की विजय हुई। राष्ट्रपति विल्सन, लॉयड जार्ज तथा अन्य राजनीतिक नेताओं ने आत्मनिर्णय के सिद्धांत की घोषणा की। इन नई परिस्थितियों के अनुसार दिल्ली अधिवेशन में कांग्रेस ने मौंटेग्यू चेम्सफोर्ड योजना के संदर्भ में अपनी स्थिति पर पुनरवलोकन किया - ÷÷स्वतंत्र उपनिवेश÷÷ की मांग फिर उठाई गई तथा शांति सम्मेलन में प्रतिनिधित्व की मांग की। इसके लिए लोकमान्य तिलक, गांधी जी और हसन इमाम को प्रतिनिधि मनोनीत किया गया। कांग्रेस ने सभी दमनकारी कानूनों को वापस लेने का भी आग्रह किया। लेकिन दिल्ली अधिवेशन की मांगों की न केवल अवहेलना ही की गई बल्कि अंग्रेज सरकार, युद्ध जीतने के बाद, भारत में आंदोलनों तथा विद्रोह को अपने तरीकों से दबाने के लिए अब स्वतंत्र हो गई थी और 1919 ने यह दिखा भी दिया। फरवरी 1919 में सर्वोच्च विधान परिषद में रौलेट विधेयक प्रस्तुत किया गया। रौलेट एक्ट पर प्रतिक्रियाएं उन्होंने घोषणा की कि अगर रौलेट सिफारिशें पारित की गईं तो वे सत्याग्रह आरंभ कर देंगे। तुरंत वे पूरे देश के भ्रमण पर निकल पड़े। हर स्थान पर उनका पूरे उत्साह से स्वागत किया गया। 18 मार्च को उन्होंने यह संकल्प प्रकाशित किया। ÷÷हमारे विचार में 1919 का भारतीय फौजदारी कानून संशोधन विधेयक संख्या एक तथा 1919 का फौजदारी कानून आपात शक्तियां विधेयक संख्या दो, अन्यायपूर्ण हैं। ये विधेयक स्वतंत्रता तथा न्याय के सिद्धांतों के लिए घातक हैं तथा नागरिकों के उन प्राथमिक अधिकारों का हनन करते हैं जिन पर समूचे भारत तथा स्वयं राज्य की सुरक्षा टिकी हुई है। हम पूरी निष्ठा से प्रतिज्ञा करते हैं अगर इन विधेयकों को कानून का रूप दिया गया तो हम इन कानूनों की तब तक सविनय अवज्ञा करेंगे, जब तक इन्हें वापिस न ले लिया जाए। इसके बाद बनाई गई किसी समिति ने अगर ऐसे ही अन्य कानून बनाए जाने की सिफारिश की तो हम उनकी भी इसी प्रकार अवज्ञा करेंगे। हम यह भी प्रतिज्ञा करते हैं कि हम अपने संघर्ष में सत्य का निष्ठापूर्वक पालन करेंगे और हिंसा का प्रयोग बिल्कुल नहीं करेंगे जिससे कि किसी व्यक्ति अथवा किसी के जीवन तथा संपत्ति को हानि हो÷÷। हड़ताल के लिए 30 मार्च 1919 का दिन निश्चित किया गया लेकिन बाद में इसे 6 अप्रैल कर दिया गया। 6 अप्रैल 1919 भारत के इतिहास में महत्वपूर्ण दिन था। लोगों ने महात्मा गांधी के इस आह्वान पर जिस तरह से उत्साह दिखाया उससे न केवल सरकार बल्कि नेताओं को भी अचंभा हुआ। युद्ध में विजय के उन्दाम ने अंग्रेज सरकार का दिमाग खराब कर दिया था। इसी उन्माद में वह लोगों पर टूट पड़ी। कई स्थानों पर गोली चली। दिल्ली में जब अंग्रेज सैनिकों ने स्वामी श्रद्धानंद को गोली मारने की धमकी दी तो स्वामी जी सीना खोल कर बंदूकों के सामने तन कर खड़े हो गए। हिंदू मुस्लिम भाईचारे के कई मार्मिक दृश्य देखने में आए। स्वामी श्रद्धानंद को जामा मस्जिद के मंच से उपदेश देने की अनुमति दी गई। पूरे देश में इस नव-विचार का अनुकरण किया गया। लोग जैसे इसी प्रकार के किसी उदाहरण की प्रतीक्षा में थे। राष्ट्रीय संघर्ष का एक नया अध्याय आरंभ हो चुका था। जल्दी ही पंजाब की घटनाओं ने राष्ट्रीय चेतना की एक नई, तीव्र धारा को जन्म दिया। पंजाब में दमन-चक्र पंजाब की कहानी हर व्यक्ति को मालूम है। उसकी स्मृतियां जगज+ाहिर हैं और उन के विस्तार में जाने की आवश्यकता नहीं। 1919 में पंजाब में कट्टर साम्राज्यवादी सर माइकल ओ÷डायर का शासन था। उस की हमेशा यही कोशिश रहती थी कि देश के विभिन्न भागों के क्रांतिकारियों की गतिविधियों का कोई प्रभाव पंजाब पर न पड़ने पाए। 1919 में कांग्रेस का अधिवेशन अमृतसर में होना था। सर माइकल ओ÷डायर ने कांग्रेस के दो स्थानीय नेताओं डा. सैफुद्दीन किचलू और डा. सत्यपाल को अपने यहां बुलाया लेकिन उन्हें हिरासत में लेकर किसी अज्ञात स्थल पर भेज दिया गया। 10 अप्रैल 1919 की घटना है। लोगों का एक सैलाब सड़कों पर उमड़ पड़ा। वे जिला मैजिस्ट्रेट से मिल कर यह जानना चाहते थे कि उनके प्रिय नेता कहां हैं। लेकिन वहां गोली चली, पत्थरबाजी हुई और कई लोग हताहत हो गए। लोग उत्तेजित हो गए और भीड़ ने पांच अंग्रेजों को मार डाला। एक बैंक तथा कुछ अन्य इमारतों को आग लगा दी। गुजरांवाला तथा कसूर में भी ऐसी ही घटनाएं हुईं। कुछ अन्य स्थानों पर भी छुटपुट विरोध हुआ। उसी दिन पूरे पंजाब में मार्शल लॉ लगा दिया। मार्शल लॉ के दिनों पंजाब में कैसी-कैसी वारदातें हुईं, लोगों को कैसी-कैसी यातनाएं दी गईं और जलियांवाला बाग में कैसे निर्दोष निरीह लोगों को गोलियों से भून दिया गया। इनका संक्षिप्त वर्णन दिया जा रहा है। जलियांवाला बाग की चारदीवारी में निहत्थी भीड़ पर तब तक गोलियों की वर्षा की गई जब तक कि सारा गोली बारूद समाप्त नहीं हो गया। सरकार ने स्वयं यह स्वीकार किया कि 379 व्यक्ति मरे और 1200 घायल हुए जिन के लिए चिकित्सा उपचार की भी कोई व्यवस्था नहीं की गई। अति उदारवादी न्यायविद सर पी.एस. शिवास्वामी अय्यर ने जलियांवाला बाग में किए गए अत्याचार का वर्णन इस प्रकार किया हैः ÷÷जलियांवाला बाग में एकत्र निहत्थे लोगों को तितर-बितर होने का कोई अवसर दिए बिना उन का नृशंस नरसंहार, गोली कांड में घायल सैंकड़ों लोगों की पीड़ा व चोटों के प्रति जनरल डायर की लापरवाही, छंट रही भीड़ और भागते हुए लोगों पर मशीनगनों से गोलीवर्षा, लोगों को सार्वजनिक तौर पर कोड़ों की सजा, हजारों छात्रों को हाजिरी देने के लिए आदेश जिन के कारण उन्हें प्रतिदिन लगभग 16 मीन चलना पड़ता, 500 छात्रों और प्राध्यापकों की गिरफ्तारी और उन्हें हिरासत में रखना, झंडे झंडे को सलामी देने के लिए पांच से साम वर्ष तक के स्कूली बच्चों को परेड के लिए मजबूर किया जाना, जिन लोगों की दीवारों पर मार्शल लॉ के इश्तिहार चितकाए गए उन की सुरक्षा की जिम्मेदारी उन्हीं पर थोपना, बारात को कोड़े लगाना, चिट्ठियों पर सेंसर, बादशाही मस्जिद को छः सप्ताह के लिए बंद करना, लोगों को बिना किसी ठोस कारण के गिरफ्तार करना और हिरासत में लेना, खासतौर पर उन तक को भी जिन्होंने युद्ध के दिनों में आर्थिक तथा अन्य प्रकार से सरकार की सहायता की थी, इस्लामिया स्कूल के छः बड़े बच्चों को मात्र इसलिए कोड़ों की सजा देना क्योंकि वे स्कूली बच्चे थे और बड़े थे, गिरफ्तार लोगों को बंद करने के लिए खुला पिंजरा बनाया जाना, रेंगने या मेंढक की तरह कूदने जैसी नई नई सजाएं देना जिन का किसी सैनिक अािवा असैनिक कानून व्यवस्था में कहीं कोई वर्णन नहीं मिलता, लोगों को हथकड़ी डाल कर या रस्सी से बांध कर पंद्रह घंटों तक खुले ट्रकों में रखना, निहत्थे नागरिकों के विरुद्ध विमानों, लेविसगनों और वैज्ञानिक हथियारों का प्रयोग, लोगों को बंधक बनाना तथा गैर हाजिर लोगों की उपस्थिति के लिए उन के परिवार अथवा रिश्तेदारों की संपत्ति जब्त कर लेना या नष्ट कर देना, मुसलमान और हिंदु को जोड़े बना कर हथकड़ी डालना ताकि लोगों को दिखाया जाए कि हिंदु मुस्लिम एकता का अंजाम यह होगा, भारतीयों के घरों से पानी-बिजली काट दे
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