कांग्रेस अध्यक्ष के भाषण

चौधरी रणवीर सिंह की स्मृति में डाक टिकट जारी होने के समय संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की अध्यक्ष के भाषण का प्रमुख अंश बालयोगी ऑडिटोरिअम, संसद् भवन-नयी दिल्ली 01 फरवरी, 2011


मुझे खुशी है, कि संचार मंत्रालय ने चौधरी रणवीर सिंह जी की स्मृति में डाक-टिकट जारी करने का निर्णय लिया।

जब हम अपने स्वाधीनता सेनानियों, देश-भक्तों और राष्ट्र-निर्माताओं को आदर के साथ याद करते हैं, तो हम एक तरह से अपने लिए ही कुछ करते हैं। हमारे पर उनके त्याग और बलिदान का एक बहुत बड़ा कर्ज़ है। कम से कम इस बहाने हम उस कर्ज़ का एहसास तो कर ही लेते हैं। दूसरा लाभ यह होता है, कि अगर हम खुद अपने देश और समाज के लिए कुछ करना चाहते हैं, तो स्वयं कष्ट उठाकर कुछ अच्छा करने की प्रेरणा हमें अपने पूर्वजों से मिलती है।

आज से पांच वर्ष पहले मैंने चौधरी रणवीर सिंह जी के अभिनंदन ग्रंथ का लोकार्पण किया था। तब वे हमारे बीच में थे और संविधान सभा के एक मात्र जीवित सदस्य के रूप में उनका उस समय मौजूद रहना और नब्बे साल की उम्र में खड़े होकर अपनी बात कहना, सभी के लिए एक सुखद अनुभव था।

चौधरी रणवीर सिंह उस पीढ़ी के व्यक्ति थे, जिसने एक ऐसे दौर में आंखें खोलीं, जब सारे देश में स्वाधीनता की चेतना फैली हुई थी। उनके पिता चौधरी मातूराम स्वयं एक राष्ट्रवादी और देश-भक्त थे। इसी नाते लाला लाजपत राय, सरदार अजीत सिंह और स्वामी श्रद्धानन्द जैसे देश-भक्तों से उनके संबंध थे। उन्नीस सौ इक्कीस में जब गांधी जी रोहतक आए, तो उस सभा की अध्यक्षता चौधरी मातूराम ने की थी।

ऐसे वातावरण में जन्म लेकर चौधरी रणवीर सिंह का स्वाधीनता आंदोलन में भाग लेना, बरसों अलग-अलग जेलों में रहकर देश की आज़ादी के लिए तक़लीफ़ उठाना, एक तरह से अपने परिवार की परंपरा को आगे बढ़ाने का काम था।

संविधान सभा के सदस्य, अंतरिम, पहली और दूसरी लोकसभा के सदस्य, फिर पंजाब विधान सभा के सदस्य, मंत्री, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और राज्य सभा के सदस्य जैसी अपनी सभी ज़िम्मेदारियां उन्होंने निष्ठा और ईमानदारी से निभायीं।

सबसे बड़ी बात यह, कि चौंसठ साल की आयु में उन्होंने स्वेच्छा से राजनीति से सन्यास लिया।

आज जब लोग धन और पद के पीछे आंख बंद कर भागते दिखायी देते हैं, तो उस समय इस तरह के दृष्टि-कोण का महत्व और बढ़ जाता है।

आज कल अक्सर यह महसूस होता है, कि हम स्वाधीनता आंदोलन और अपने पूर्वजों के मूल्यों से बहुत अलग जा चुके हैं। सभी को यह सोचना चाहिए, कि हम नयी पीढ़ी के सामने कौन सा आदर्श छोड़ रहे हैं। सत्ता और धन ही सब कुछ नहीं है। उससे मिलने वाला सुख ही सब कुछ नहीं है। फिर उस सुख की भी एक सीमा है। एक सीमा तक ही उसका उपयोग हो सकता है। उसके बाद यह सिर्फ़ लोभ और लालच है, एक भ्रम है, जिसके पीछे दुनिया भाग रही है। जब हम अपने स्वाधीनता सेनानियों को याद करते हैं, तो यह सब भी याद रखना चाहिए, कि यदि वे केवल निजी सुख-सुविधा, लोभ और लालच में पड़े रहते, तो देश की आज़ादी के लिए कुछ नहीं कर पाते।

सार्वजनिक जीवन का अर्थ यह है, कि हम आम आदमी के दु:ख और दर्द को समझें, उसे दूर करने के लिए संघर्ष करें। आज जिस तरह आतंकवाद, सांप्रदायिक और जात-पांत के ज़हर से हमारे समाज को नष्ट करने के प्रयास हो रहे हैं, उनके खिलाफ़ संघर्ष करें। युवा-वर्ग के लिए अच्छी शिक्षा और रोज़गार के नये-नये अवसर पैदा करने के लिए काम करें। अपने निहित स्वाथो को छोड़कर ग़रीब और कमज़ोर के उत्थान के लिए समर्पित हों। अपने किसान भाइयों और गांवों, जो हमारे देश की आत्मा हैं, उनके प्रति प्रेम और संवेदना की भावना से अपना कर्तव्य निभाएं। यही सब करके हम आने वाली पीढ़ी को कुछ सिखा सकते हैं और कुछ दे सकते हैं।
 

   

 

 
 

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